अनछुआ इश्क़

‘Anchhuaa Ishq’, a poem by Pallavi Vinod

मिलना हमारी नियति नहीं थी
फिर भी हम प्रेम में थे
नदी के दो किनारों-से
एक दूसरे के अहसासों से भीग रहे थे
पता था, हम जिस राह पर हैं
बिछड़ना तय है
फिर भी बहुत दूर तक साथ चलते रहे
हाँ! हमने नहीं थामा था एक दूसरे का हाथ
फिर भी कभी किसी मोड़ पर
हमारी उँगलियों के छू जाने का भरम
सारी थकन मिटा देता था।
वो पड़ाव जहाँ से तुम्हें आगे बढ़ जाना था
और मुझे ठहरना था
मैं अब तक वहीं रुकी हुई हूँ
लगता है पहाड़ों पर मचलती धूप-सी
आती-जाती तुम्हारी यादें
बुझे हुए चूल्हे के अंदर बची आग-सी
मुझमें बाकी रह गयी हैं
और एक अहसास जो कभी नहीं मरता
कि कभी किसी ने इस जिस्म में बसी रूह को छुआ था
उसके बाद वहाँ जाने के रास्ते बंद हो गए
लोग कहते हैं प्रेम संसर्ग का माध्यम ढूँढता है
मैं खिलखिला के कहती हूँ
इश्क़ मेरा अनछुआ था।