‘Andolan’, a poem by Neha Tyagi

मौन धरा
विक्षिप्त गगन
दुखता गहरा
उन्माद का क्षण
समय ठहरा
जब चीख़ा तन
सम्मान हरा
व्याकुल जन-मन
लाँघे पहरा
हर घर-आँगन
अपराध डरा
जब आंदोलन
चुप को ठुकरा
अब आंदोलन!
अब आंदोलन
अब आंदोलन
अब आंदोलन..

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नेहा त्यागी
मेरी क़लम ही मेरी पहचान है..

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