कविताओं के
अनकहे, अनचाहे,
अनगिनत मोड़ पे
मैं कलम को
उस आधे गीले
आधे सूखे कागज़
पे छोड़कर
उठ जाता हूँ
और टहल लेता हूँ
अपने ज़हन की सरहदों पर
यह सोचकर
कहीं लांघ न लूँ
वो पतली लकीर
जहाँ
कोरी कंजक कुँवारी कल्पनाएँ
पहन लेती हैं मुखौटा
और लगने लगती है स्वांग
हक़ीक़त को छू नहीं पाती
कल्पनाओं से परे होती हैं
वैसे ही जैसे
बदन को छू के निकल
जाता है हवा का झोंका
लेकिन ठहरता नहीं
ज़हन में खुशबू की तरह
बहुत देर तक
बहुत देर तक…

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