मुझे तुम्हारे चेहरे से
किसी भीगी किताब की गंध आती है-
और लगता है अक्सर
कि जीवन के अधिकतर सवालों के सामने
हम एक ही कक्षा के विद्यार्थी हैं।
तुम्हारी आँखों में दिखती है
अपनी ही दृष्टि!
हमने सुखों को बहुवचन में जिया,
दुःखों का सामूहिक सत्कार किया।
हमारी चेतना पर जमी काई का रंग एक है,
किन्तु अलग हैं हमारी यात्राओं के बिन्दुपथ
जो छूकर निकलते हैं, नज़दीक से।
मैं उठाता हूँ ख़ुद को,
समेटता हूँ अपनी उपस्थिति को,
निकलता हूँ यात्रा पर-
फिर देखता हूँ उसी क्षण
कि मेरे पाँवों में लग गयी है…
तुम्हारे गाँव की मिट्टी,
मिट्टी में वही भीगी किताब की गंध!

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