क्रोध का हलाहल इतना व्याप्त था कि
उसका सम्पूर्ण अस्तित्व हो गया था विषमय
मेरे पास थी सिर्फ़ एक बूँद मिठास
चाहा था उसे सागर में घोलना
उसे मीठा करना
पर वह पर्याप्त न था
मैं चूक गई
असफलता थी यह मेरी या प्रेम की
ढ़ूँढती रही जवाब ताज़िन्दगी

अगर प्रेम से बढ़कर कोई शय नहीं
तो अमृत की एक बूँद को ही पर्याप्त होना था
सागर को अमृतमय बनाने के लिए
पर यह हुआ नहीं
क्या अनुपात का दोष?

तो चल पड़ी हूँ असम्भव को सम्भव बनाने
कभी तो यह आसमान उतरेगा मुझमें
सूर्य तारे नक्षत्र समा जाएँगे मेरे अंदर
तब बूँद में सागर उतरेगा
अभी तुम हँस लो मुझ पर जितना चाहो
पर एक दिन तुम देखोगे
यह अचम्भा अपनी आँखों से सच होते
पर तब तुम मुझे अपनी बाँहों में न समेट सकोगे
मैं धरती में समा जाऊँगी
आसमान में जज़्ब हो जाऊँगी

क्षुद्रता जब मिटेगी
क्या मेरा प्यार सिर्फ़ तुम्हारे लिए होगा?

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