ये सब के सब जैसे-के-तैसे
सोफ़ासेट, पलंग, कुर्सी, खिड़कियाँ, दरवाज़े, पर्दे
सीलिंगफ़ैन, घड़ी की सुइयाँ, टक-टक और बन्द
अँधेरी दीवारों पर टँगा है ईश्वर
नश्वर पिता के फ़ोटो की फ़्रेम में मढ़ा हुआ।

स्विच के ऑन-ऑफ़ से अब कोई फ़र्क़ नहीं
अन्धकार की पीठ पर सवार रेगिस्तान बलबलाता दौड़ता है
दीवारों को अफ़सोस नहीं है इसका
कभी इनके पंख पत्थर के होते हैं
और कभी पानी के।

एक कमरे से दूसरे कमरे में
दूसरे से तीसरे कमरे में
कौन घूमता फिरता है? कमरा? एक दो और तीन?
या फिर सबके सब?

थिरकते हैं, थमते हैं, चरण-चिह्न पवन की पाँखों के
तड़फड़ाकर मर जाता है वन में जटायु
उड़ना, उड़ते रहना, उड़ते जाना
दीवार से दीवार तक
वित्ते भर की दूरी पर न होना
झपट्टा मारकर श्वास का डूब जाना
फिर ठीक सतह से उड़ना
या फिर बस ममी की भाँति जैसे-का-तैसा,
सतह पर बैठे रहना!

बीच में दीवार
दीवार के बीच में
बीच-बीच में; इसी भाँति
ठिठुरे हुए अन्धकार की भाँति
उगना,
अरे भाई अपना तो… कहिए कि अपना तो यूँ है
आतम को उढ़ाकर मस्तक तक
अपना यह चोला लिए उड़ना है तो बस उड़ना ही है
जैसे का तैसा।

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