साम्प्रदायिकता और संस्कृति

प्रेमचंद का लेख 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' | 'Sampradayikta Aur Sanskriti', an article by Premchand साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली...

हम ग़द्दार

अमृता प्रीतम की सम्पादकीय डायरी से मैं नहीं जानती—दुनिया में पहली कौन-सी राजनीतिक पार्टी थी, और समय का क्या दबाव था कि उसे लोगों की...

नारी तुम केवल श्रद्धा हो

'आदमी की निगाह में औरत' से दलितों के साथ स्त्रियों की दुर्दशा भी गाँधीजी का बहुत बड़ा सरोकार रही है। वह उनके सामाजिक सर्वोदय का...

निरुद्देश्‍य

'घुमक्कड़-शास्त्र' से निरुद्देश्‍य का अर्थ है उद्देश्‍यरहित, अर्थात् बिना प्रयोजन का। प्रयोजन बिना तो कोई मंदबुद्धि भी काम नहीं करता। इसलिए कोई समझदार घुमक्कड़ यदि...

मैं लेखक कैसे बना

'टुकड़े-टुकड़े दास्तान' से अपने बचपन और नौजवानी के दिनों का मानसिक वातावरण देखकर यह तो कह सकता हूँ कि अमुक-अमुक परिस्थितियों ने मुझे लेखक बना...

मेरे समकालीन: डॉ० भीमराव अम्बेडकर

डॉ० अम्बेडकर के प्रति और अछूतों का उद्धार करने की उनकी इच्छा के प्रति मेरा सद्भाव और उनकी होशियारी के प्रति आदर होने के...

समकालीन युवा लेखन पर कुछ विचार

जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...

साहित्य सत्ता की ओर क्यों देखता है?

यह एक अजीब बात है कि इधर साहित्यकार में शिकवों और शिकायतों का शौक़ बढ़ता जा रहा है। उसे शिकायत है कि गवर्नर और...

लिखने के तीन प्रश्न

लिखने की कला मानव इतिहास में एक धूमकेतु की तरह उपजी थी। मनुष्यता की यात्रा में, ध्वनियों और आवाज़ों का लिखा जाना, एक अप्रतिम...

लघु-कथा

लघु-कथा छोटी कहानी का अति संक्षिप्त रूप है। शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से लघु-कथा और छोटी कहानी दोनों एक ही साहित्य-रूप का बोध कराती...

शादी: एक ग़ैर-ज़रूरी सोशल एग्रीमेंट

हालांकि मैं ये तहरीर लिखते वक़्त जानता हूँ कि मुझे भी कभी न कभी इस फन्दे में पाँव रखना पड़ सकता है और वो...

मैं अफ़साना क्योंकर लिखता हूँ

मुअज़्ज़िज़ ख़्वातीन व हज़रात! मुझसे कहा गया है कि मैं यह बताऊँ कि मैं अफ़साना क्योंकर लिखता हूँ। यह 'क्योंकर' मेरी समझ में नहीं आया—...

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Rabindranath Tagore

साहित्य की सामग्री

राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित 'साहित्य विधाओं की प्रकृति' से  अनुवाद : वंशीधर विद्यालंकार केवल अपने लिए लिखने को साहित्य नहीं कहते हैं—जैसे पक्षी अपने आनंद के...
Faiz Ahmad Faiz

इस वक़्त तो यूँ लगता है

इस वक़्त तो यूँ लगता है, अब कुछ भी नहीं है महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन और...
Bheedtantra - Asghar Wajahat

‘भीड़तंत्र’ से दो लघु कहानियाँ

राजपाल एण्ड सन्ज़ से प्रकाशित असग़र वजाहत की किताब 'भीड़तंत्र' से साभार स्वार्थ का फाटक —“हिंसा का रास्ता कहाँ से शुरू होता है?” —“जहाँ से बातचीत का...
Pratibha Sharma

लाल रिबन

मेरे गाँव में सफ़ेद संगमरमर से बनी दीवारें लोहे के भालों की तरह उगी हुई हैं जिनकी नुकीली नोकों में नीला ज़हर रंगा हुआ है खेजड़ी के ईंट-चूने...
Subhadra Kumari Chauhan

यह कदम्ब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ | Yah Kadamb Ka Ped यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥ ले...
Sleepless, Person sitting

यह स्त्री सोयी नहीं है

बहुत अर्से से यह स्त्री सोयी नहीं है उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे इसका प्रमाण हैं समस्त सृष्टि को अपने आग़ोश में लेकर उसे विश्राम दिलाने का दावा करती रात्रि का...
Trilochan

तुम्हें जब मैंने देखा

पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा सोचा था इससे पहले ही सबसे पहले क्यों न तुम्हीं को देखा! अब तक दृष्टि खोजती क्या थी, कौन रूप, क्या रंग देखने को उड़ती थी ज्योति-पंख...
Amir Khusrow

अमीर ख़ुसरो के दोहे

अमीर ख़ुसरो के दोहे | Amir Khusro Ke Dohe ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग॥ ख़ुसरो...
Meena Keshwar Kamal

मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी

मैं वह औरत हूँ जो जाग उठी है अपने भस्‍म कर दिए गए बच्‍चों की राख से मैं उठ खड़ी हुई हूँ और बन गयी हूँ एक...
Dinkar

अवकाश वाली सभ्यता

मैं रात के अँधेरे में सितारों की ओर देखता हूँ जिनकी रोशनी भविष्य की ओर जाती है अनागत से मुझे यह ख़बर आती है कि चाहे लाख बदल...
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