और मैंने गढ़ा प्रेम

‘Aur Maine Gadha Prem’, a poem by Santwana Shrikant

मैंने नींद माँगी थी
तुमने बदल दिया इसे
स्याह रातों के ख़ौफ़ में।
मैं प्रेम की नदी
बनकर बही
तुमने खड़ी कर दी
भूख की ऊँची दीवारें।
मैंने समर्पण कहा,
तुमने क्रांति कहा।
मैंने कहा-
सभ्यताओं को संवर्धित
करने के लिए क्यों न
रोप दूँ प्रेम का बीज,
तुमने उलाहना दिया
हत्याओं का…
आँखों से खून बहाया,
तुम सदी के महान कवि बने
और मैंने गढ़ा प्रेम।

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