मेरी तो जान हैं
तुम्हारे ये सीने, तुम्हारे ये सिर
जो अपने सपनों के रोशनदान से
आज़ादी का आसमान
देखने को मचल रहे हैं।

तुम्हारे सिर और सीनों में धधक रहे
इस सपने का रंग
किसी भी मौसम के सुहावनेपन से
अरबों गुणा सुन्दर है
वैसे भी
मौसम अपने रंग
आसमान पर नहीं लादता
वह अपने रंग
आसमान से ही उधार लिया करता है।

आसमान अपनी देह से
मौसम की
किसी भी परछाईं को
जब चाहे तब
फेंक सकता है
और तुम
अपने कन्धों पर
केवल मौसम ही नहीं
पूरा आकाश भी उठा सकते हो।

जयप्रकाश लीलवान की कविता 'क्या-क्या मारोगे?'

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