अनुराधा बेनीवाल की यह पहली किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’, राजकमल प्रकाशन की ‘यायावरी आवारगी’ शृंखला का पहला पड़ाव है। वैसे तो शृंखला के नाम से व्यक्त है कि यह एक यात्रा-वृत्तांत (travelogue) है, लेकिन किताब के नाम में आया शब्द ‘आज़ादी’ इसे एक नया ही आयाम दे देता है। इस किताब में हरियाणा से आने वाली लेखिका अनुराधा बेनीवाल ने अपनी यूरोप के देशों में घूमने की कहानियाँ बयान की हैं। लेकिन भारतीय परिवेश को देखते हुए और किसी महिला लेखक की ऐसी किसी किताब से पहले मुलाक़ात न होने की वजह से मेरे लिए यह समझना सहज ही रहा कि ये कहानियाँ केवल विदेश-भ्रमण की कहानियाँ न होकर उनके मन के भीतर के शहरों में भी पाँव पसारेंगीं और वही हुआ भी। हाँ बस उन शहरों के रंग-रूप और मौसम और वो भीतर के शहर कितने महँगे हैं यह मुझे किताब पढ़ने के बाद ही पता चल पाया।

इस किताब के इन दो पहलुओं की अलग-अलग बातें करेंगे क्योंकि किताब में दोनों ही पहलू अनुराधा बड़े ही सहज ढंग से लेकर आगे बढ़ी हैं।

नए जमाने की यह ‘भारतीय फ़कीरन’ अपनी यात्रा पेरिस से शुरू करती है और फिर ब्रस्सल्स, एम्स्टर्डम, बर्लिन, प्राग, ब्रातिस्लावा, बुडापेस्ट, इंस्ब्रुक और बर्न होते हुए फिर पेरिस लौटकर अपने घंटों न थकने वाले पैरों को आराम देती है। आप कहेंगे इतनी जगहों की यात्रा उन्होंने पैदल थोड़े ही की होगी? जवाब है बिलकुल नहीं की, लेकिन अनुराधा को रास्ते में लिफ्ट देने वाले पात्र हों या ट्रेन की महँगी टिकट बुक कराने से पहले की झिझक, इन सबसे ज़्यादा रोचक था अनुराधा का विदेशी शहरों की गलियों में पैदल घूमना, जिसमें कभी वो रास्ता भूल जाया करती थीं, तो कभी किसी के गलत रास्ता बताने पर उलटी दिशा में आधा घंटा चलने के बाद वापसी का सफ़र एक घंटे में पैदल तय करती थीं और कभी रास्ता न पता होने पर पहाड़ी पर यह सोचकर ऊपर चढ़ जाया करती थीं कि रास्ता गलत भी हुआ तो थकने के बाद पहाड़ी से उतरना, चढ़ने की अपेक्षा आसान रहेगा। ये कुछ ऐसी बातें हैं जिनसे पाठक को कभी यह नहीं महसूस होता कि कोई पैशनेट घुमक्कड़ अपनी सैंकड़ों यात्राओं में से एक यात्रा बड़े ही सुन्दर और मन-लुभावन शैली में सुना रहा है कि आप बस सोचते रह जाएँ कि काश हम भी यह कर पाते। यहाँ तो पढ़कर मन में केवल यही आता है कि अपनी थोड़ी सी सेविंग्स लेकर अगर हम भी घूमने निकल जाएँ तो खुद को शायद ऐसी ही कुछ परिस्थितियों में पाएंगे।

अनुराधा की यात्राओं की दूसरी सबसे रोचक बात रही विभिन्न शहरों में उन्हें आसरा देने वाले उनके अनूठे होस्ट। कोई एक डॉक्टर है जो तीस लोगों को एक साथ पनाह दिए हुए है तो कोई लड़की अपनी माँ के खिलाफ जाकर अनुराधा को होस्ट करती है। कहीं दरवाजा नहीं है तो मेज और अपने बैग्स सटाकर रात गुज़री तो किसी का बाथरूम जंगल सा लगा। कोई ज़रूरत से ज्यादा बेबाक दिखा तो कोई दोस्तों जैसा मददगार, किसी से मानवीयता के नए आयाम सीखे तो किसी से धर्म पर एक लम्बी बहस हुई। इन सब के अलावा शहर के म्यूजियम हों या रेड लाइट एरिया, शहर के बीचों-बीच बहती झील हो या घरों से होते पहाड़ी रास्ते, अलग-अलग देशों के अलग-अलग मौसम, संस्कृति, खान-पान और इतिहास टटोलती अनुराधा, अपने मन और बजट के अनुसार बस आगे बढ़ती जाती हैं।

Azadi mera brand 2

इस किताब का दूसरा पक्ष उस सफर को दिखाता है जो एक भारतीय लड़की को अपने घर की चौखट से पाँव निकालने से पहले तय करना पड़ता है। दुनिया भर में नाम रोशन करतीं भारतीय लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा कितनी ज़्यादा मेहनत और संघर्ष करना पड़ता है, यह सब जानते हैं। लेकिन इस बात को स्वीकारना आज भी लोगों को मंजूर नहीं। इस किताब में अनुराधा इसी ओर इशारा करती चलती हैं या कह लूँ इशारा नहीं, चिल्लाती चलती हैं, अगर पढ़ने वाला सफ़ेद कागज़ पर पड़े उन शब्दों को सुन पाए तो-

“मेरे समाज की लड़कियाँ यूँ ही बिना काम नहीं टहलती थीं। लड़की का बाहर जाना बिना किसी काम के अकल्पनीय था। क्यों जाएगी लड़की बाहर? क्या करने? ज़रूर किसी से मिलने जाती होगी। या कोई काम करवाने। बाहर के काम तो घर के लड़के लोग कर देते थे। बिजली-पानी का बिल भरना, घर का सामान लाना, सब्जी-भाजी लाना सभी तो लड़कों के जिम्मे था। लड़कियाँ तो सिर्फ लिस्ट बनाती थीं। लेकिन लड़के अक्सर कह दिया करते थे, ‘मैं ज़रा टहल के आता हूँ।’ ‘बाहर जाके आता हूँ।’ ये शब्द मैंने लड़कियों के मुँह से कभी नहीं सुने थे- ‘मैं ज़रा टहल के आती हूँ।’ ‘यूँ ही थोड़ी हवा खा के आती हूँ।’ लड़कियों के मुँह से ये शब्द अपने गाँव के समाज में तो कभी नहीं सुने थे मैंने!”

सामान्य रूप से यह किताब एक लड़की को सम्बोधित करती हुई प्रतीत होती है लेकिन जहाँ-जहाँ भी अनुराधा ने अपनी यात्रा के किस्सों के साथ अपने समाज और उसमें एक लड़की को देखने का नज़रिया अपने शब्दों में व्यक्त किया है, वहाँ-वहाँ मुझे पढ़ने के दौरान किताब के पन्नों के बीच वो जगह ढूंढनी पड़ी जिसमें थोड़ी देर के लिए मुँह छिपाया जा सके। कहने को कह सकते हैं कि यह बातें तो आजकल आम हैं और कई लोग और बहुतेरे पुरुष भी इन मुद्दों पर बात करते हैं, इस भेद को ख़त्म करने की कोशिश करते नज़र आते हैं लेकिन कितनी ही कोशिशों के बावजूद अभी भी कोई ऐसी लड़की आस-पास नहीं दिखती जिसके जीवन में संघर्षों का कारण उसका लड़की होना न हो। अनुराधा का ऐसी ही एक लड़की होने से लेकर, उनका खुद को जानना, पारिवारिक और व्यक्तिगत खुशियों में अंतर करके देख पाना, उस अंतर की जकड़नों से उभरकर अपनी आज़ादी को ढूँढना और उस आज़ादी की कीमत पहचानने की भी कहानी है ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’।

“आज़ादी बड़ी अनोखी-सी चिड़िया है, यह है तो आपकी, लेकिन समय-समय पर इसको दाना डालना होता है। अगर आपने दाना उधार लिया तो चिड़िया भी उधार की हो जाती है।”

इसके अलावा भी अनुराधा को जहाँ अवसर मिला, उन्होंने अपनी यात्रा के किसी भी पड़ाव में उन चीज़ों को रेखांकित करने में कोई गुरेज़ नहीं किया जिन्हें हम अपनी पुरानी होती परम्पराओं के चलते ढोए जा रहे हैं और उससे सम्बन्धित दुनिया भर में आए बदलावों की तरफ आँखें मूँद कर बैठे हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय समाज में आज भी एक बढ़ती उम्र के इंसान के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ शादी है और एक शादीशुदा नारी के लिए उसका परिवार। न हम यह देख पाते हैं कि एक लड़की भी अपनी शारीरिक ज़रूरतों के प्रति सजग हो सकती है और न यह स्वीकार करना हमारे लिए आसान होता है कि हमारी माँ के जीवन में हमसे बाहर भी एक दुनिया हो सकती है जिसमें वो ‘अपने’ दोस्तों के साथ को एन्जॉय कर सके। न हम इतिहास में दोहरायी गयी अपनी गलतियों से सीखने को तैयार हैं चाहे उसे संस्कृति, अध्यात्म या धर्म किसी भी चीज़ से छुपाना पड़े और न ही एक इंसान के तौर पर केवल इतना भी सुधरने को तैयार हैं कि हमारे देश के अगर एक नागरिक का मन करे तो वह बिना यह सोचे कि वह लड़का है या लड़की, जब मन चाहे, जहाँ मन चाहे, घूम-फिर सके। इन तमाम बातों को अनुराधा ने बड़े ही तर्कपूर्ण और बेबाक तरीके से और बिना अपनी यात्रा के किसी भी क्षण को रसहीन बनाते हुए सामने रखा है।

अनुराधा की लेखन शैली की बात करें तो किताब पढ़कर यह कहीं नहीं लगा कि यह अनुराधा की पहली किताब है। कहानी सुनाने का अंदाज़ रोचक है और जहाँ ज़रूरत पड़ी, वहाँ पाठक से सीधा संवाद करते हुए, बिना किसी झिझक के अपनी सोच व्यक्त कर दी। भूमिका में उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी भाषा पर मेहनत करनी पड़ी तो वह मेहनत किताब में प्रत्यक्ष रूप से सामने भी आती है। मुझे यह किताब पढ़ते हुए भाषा के स्तर पर कहीं कोई कमी नज़र नहीं आयी, बल्कि अनुराधा की भाषा शैली कुछ इस तरह की है कि पाठक अपने दिमाग पर ज़ोर दिए बिना बस पढ़ता ही चला जाता है। इसके अलावा जिस एक बात का ज़िक्र करना अनिवार्य है वह है अनुराधा की पाठकों के प्रति ईमानदारी। इस किताब में एक लेखक कभी भी एक घुमक्कड़ के ऊपर हावी नहीं हुआ और न ही वह घुमक्कड़ अपनी यात्रा की एक भव्य प्रस्तुति को लेकर बहुत ज़्यादा चिंतित। जो जैसा था, वैसा ही सामने आता प्रतीत होता है। कई जगह पढ़कर ऐसा लगा कि ‘अरे! इन्होंने यह भी बता दिया!’ और आगे पढ़ने लगो तो अनुराधा फिर मिल जाती हैं अपनी ही ऐसी कुछ पोल खोलतीं, जो आपको मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है..

“ख़ैर, अब मैं ब्लैडर के बजाय दिमाग से सोच रही थी। यह तो ख़ाली-सा लगता है। ज़रूर यहाँ का खाना अच्छा नहीं होगा। लेकिन अब बाहर भी तो नहीं निकल सकती थी, सो मैं उस स्लोवाक ड्रेस वाली लड़की से बाहर बैठने का इशारा कर, बाहर रखी कुर्सी पर बैठ जाती हूँ। सोचती हूँ, कुछ छोटा-मोटा आर्डर कर लूँगी। लेकिन फिर कहीं और कुछ खाना पड़ेगा तो- दूसरा ख़याल आता है। अब क्या करूँ? काफी देर तक सोचती रही। तब तक मेरे पास कोई आर्डर लेने भी नहीं आया। शायद वह लड़की कहीं और मशगूल हो गयी थी या मेरे मन की व्यथा समझ गई। मैं चुपचाप झोला उठाकर निकल ली। अहा, क्या आज़ादी की साँस ली मैंने! बाल-बाल बची!”

समग्रता में देखें तो घुमक्कड़ों के लिए एक वांछित और सामान्य रूप से किसी भी भारतीय के लिए एक ज़रूरी किताब। सामाजिक मुद्दों का समाधान शायद उनकी चर्चा होते रहने में ही छिपा है और उन्ही मुद्दों में से एक मुद्दा है भारत का एक समाज के रूप में अपनी मिट्टी में पैदा हुईं, खेलतीं लड़कियों के पंख सुरक्षित रख पाना। और अनुराधा ने इस पर सिर्फ चर्चा ही नहीं की, बल्कि एक दिशा भी दिखायी है जिसका अनुसरण कर लड़कियों को आगे बढ़ना सीखना है तो लड़कों को रास्ते से हटना। उम्मीद है इस किताब का प्रत्येक पाठक जब कभी अपने समाज रूपी बाज़ार में निकलेगा तो अपना ब्रांड पहचान पाएगा।

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पुनीत कुसुम
कविताओं में स्वयं को ढूँढती एक इकाई..!

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