बाँस में पुष्प खिलना

‘Baans Mein Pushp Khilna’, a poem by Manjula Bist

वे मनुष्य
सर्वाधिक कोमल रह पाए थे
जो स्वयं को सोचने भर से
छुईमुई बन जाने के अभ्यस्त हो चुके थे।

जो बार-बार निर्बल सिद्ध होने लगे थे
स्वयं की नज़रों में…
आख़िरकार उन्होनें;
एक दिन
स्वयं को लिखकर उसे सार्वजनिक किया।

जो बने रह पाए थे सबल
बनिस्बत उनके
जिन्होंने लिखा… मगर
उसे किताबों के मध्य रखकर भूल गये।

सबसे कठोर वे सिद्ध हुए
जिन्होंने दूसरों के शब्दों को भटकाकर
समय से दुरभि संधि की
और लम्बे अवकाश पर चले गये।

फिर एक दिन..
कोमल व सबल मनुष्यों ने भी
शब्दों से उठते ख़मीर को धूप दिखायी
उन्हें ताम्बई किया व बारिश में भीजने दिया
पीतवर्णी भी हुए तो… अल्पावधि के लिये ही;
क्योंकि वे जान चुके थे
रहस्य इस भाव-सम्पदा का…
कि स्वयं को लिखते जाना
कमज़ोर पड़ते हृदय की सबसे बलिष्ठ भाषा है!
गूँगी जिह्वा की अति संवेदी वाचाल ग्रन्थियाँ हैं!

हालाँकि वे सब अवगत हो चुके थे
इस महा-रहस्य से भी
कि
शब्दों को सार्वजनिक करने से
स्वयं के भीतर
बाँस में पुष्प खिलने की घटना भी हो सकती है!

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