बात निकलेगी,
निकलेगी उस रोज़
जब आसमाँ से पंछी,
पेड़ों से घोंसले,
कलियों से फूल,
कोयले से अंगार,
चूल्हे से राख,
कुएँ से पानी,
और पानी से मछली,
सब एक दूजे से रूठ जाएंगे,
बात निकलेगी उस रोज़
जब सड़कों से अपराध,
सपनों की मौत,
जिंदगी से भाग-दौड़,
होठों से सुबकियां,
माथे से शिकन,
जाड़े से धूप,
प्रेम से रस,
और कोयल की कूक,
सब एक दूजे से रूठ जाएंगे,
बात निकलेगी,
निकलेगी उस रोज़,
जब बाप की नींद,
मां का दुलार,
परिवार का प्यार,
घर का संसार,
बगिया के फूल,
गोधूली वाली धूल,
कविताओं का साथ,
और ख़ुद का थामा हाथ,
सब एक दूजे से छूट जाएंगे,
बात निकलेगी उस रोज
जब किए गए वादे,
छोड़े जाएंगे आधे,
होगी तकरार,
ना तो इनकार ना ही इकरार,
वजह होगा झूठ,
जैसे होता है जंगल में
कटे पेड़ का कोई कटा ठूँठ,
बात निकलेगी,
बात को निकलना होगा,
क्योंकि अगर यह अब न निकली
तो मुझे डर है,
कि निकलेंगे चुनिंदा आंखों से वह सैलाब,
जो पूछते रहेंगे उनसे
ज़िन्दगी भर यही सवाल,
कि बात क्यों ना निकली तब?
जो बनी मौत का सबब?
लेकिन बात निकलेगी
इसे निकलना होगा,
मुझे विश्वास है, बात निकलेगी,
क्योंकि,
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।

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