सुनो चाँद…
उस रात जब तुम आसमान में देर से उठे,
मैं बैठी थी वहीं किसी चौराहे पर शब्दों की, मात्राओं की और उनमें उलझी मुड़ी तुड़ी बातों की गठरी लिए
इस उम्मीद में, कि तुम्हारी रोशनी में एक-एक शब्द को धोऊँगी
एक डोर लूंगी जिसका एक छोर तुम से बांधकर एक छोर खुद पकड़ूँगी
और सुखाऊंगी हर गीले पड़े टपकते हुए शब्दों को,
तह लगाऊंगी बातों की
और फिर कभी मौका मिला, तो ओढ़ के उन्हीं शब्दों को, उड़ूँगी उसी आसमान में..
ओढ़ने की खातिर पहली तह को खोला ही था कि
ये आड़े तिरछे मन भर के शब्द संभाले ना संभले मुझसे
मैं उलझी पड़ी थी, उस झीनी सी बातों की ओढ़नी में,
मुझे देखने तक ना दे रही थी वो तुम्हें
तुम भी तो ना देख पा रहे थे मेरे असिद्ध से भावों को
जो रंगे थे इस कथरी को..
एक तो वो मनवन्तरों का कुहासा
और ऊपर से मेरी गठरी से निकली फिरोज़ी
नहीं.. मेरी अक्षम सी बातों की पीली ओढ़नी!
परत दर परत धूमिल कर रही थी मुझे तुम्हारे सामने
रंग और भी थे जो चढ़ आये थे तुम्हारे जाने के बाद…. सफेद, स्याह!
वह डोर जो तुमसे बांध रखी थी, लचकने लगी थी मेरे अपने ही शब्दों के भार से
डर लगने लगा था मुझे तभी… कि कहीं मेरी अपरिपक्व कोशिशों में
डोर से बंधकर मेरे हिस्से का चाँद भी ना गिर पड़े आसमान से..
और तभी हड़बड़ा कर सब समेट कर अस्त-व्यस्त सी
उठकर मुड़ गई थी मैं उसी कुहासे में..
उत्तर दिशा को जाती किसी गली में,
जिधर चाँद के किसी भी हिस्से का आना संभव न था…

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