रोज़ ही
जल-जला जाती हैं लड़कियाँ,
बाहर की दुनिया
रहती है जस-की-तस,
क्रिया नहीं
संज्ञा भर बदलती है बस

जलजला आता नहीं कहीं कोई
जल-जला आती है चुपचाप
जल-जला आना है जिसे एक-न-एक दिन
यहाँ नहीं तो वहाँ सही
वहाँ नहीं तो कहीं और सही

दुनिया को इसी तरह चलते रहना है
लड़कियों को इसी तरह जलते रहना है
एक ही क्रिया के साथ
बदलती संज्ञा को देखते रहना है!

Previous articleमाँ : छह कविताएँ
Next articleकितने दिन और बचे हैं?
साँवर दइया
साँवर दइया का जन्म 10 अक्टूबर 1948, बीकानेर (राजस्थान) में हुआ। राजस्थानी साहित्य में आधुनिक कहानी के आप प्रमुख हस्ताक्षर माने जाते हैं। पेशे से शिक्षक रहे श्री दइया ने शिक्षक जीवन और शिक्षण व्यवसाय से जुड़ी बेहद मार्मिक कहानियां लिखी, जो "एक दुनिया म्हारी" कथा संकलन में संकलित है। इसे केंद्रीय साहित्य अकादेमी का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार भी मिला।