रोज़ ही
जल-जला जाती हैं लड़कियाँ,
बाहर की दुनिया
रहती है जस-की-तस,
क्रिया नहीं
संज्ञा भर बदलती है बस
जलजला आता नहीं कहीं कोई
जल-जला आती है चुपचाप
जल-जला आना है जिसे एक-न-एक दिन
यहाँ नहीं तो वहाँ सही
वहाँ नहीं तो कहीं और सही
दुनिया को इसी तरह चलते रहना है
लड़कियों को इसी तरह जलते रहना है
एक ही क्रिया के साथ
बदलती संज्ञा को देखते रहना है!
साँवर दइया की कविता 'ख़बर करना मुझे'





