एक दिन
होठों पर मुस्कान चिपकाए-चिपकाए
जब वह बहुत थक गया,
किसी ने उसे उस वर्षावन का पता दे दिया
जिसे अभयारण्य भी कहा जाता है

उससे कहा गया
जाओ, चले जाओ वहाँ
कुछ देर चहलक़दमी करो
थोड़ी वनैली हवा अपने फेफड़ों में भरो
फिर अपनी मुस्कान को वहीं कहीं
किसी बाघ की माँद में रख आना।
बाघ तुम्हारी मुस्कान की
दिलोजान से हिफ़ाज़त करेगा,
अभयारण्य के बाघ इतने असभ्य नहीं हैं
किसी की मुस्कान को अपना आहार बनाएँ।

वह वहाँ गया
अपनी चिपकी हुई मुस्कान को
बड़ी मशक्कत के बाद होठों से छुड़ाकर
जहाँ बताया गया था, रोप आया।

माँद में बैठा बाघ उसकी इस मासूमियत को
ऊँघता हुआ ताकता रहा।
वह वहाँ से तेज़ क़दमों से चलता
वापस चला आया यह सोचता हुआ
कि आख़िर ये कैसे बाघ हैं
जो हमारी मुस्कान के लिए इतने फ़िक्रमन्द हैं!

उसने इस सवाल का जवाब जिस तिस से
किस-किस से नहीं माँगा
पर सब ख़ामोश रहे।
आख़िरकार गर्म तवे पर सिंकती रोटी,
ख़ाली अमाशय और भूख ने बताया कि
बाघ, बाघ ही होते हैं,
अपना आखेट ख़ुद करने में सक्षम,
अभयारण्यों में रहते हुए उन्होंने
घास खाना भले ही सीख लिया हो
पर वे झूठन अभी भी नहीं खाते।

भरे हुए इंसानी पेटों को अभी भी
अपनी मुस्कान और
बाघों पर क़तई ऐतबार नहीं।

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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