आदमी कुछ कहना चाहता है मगर एक ऐसा क्षण भी आता है जब उसकी आवाज़ सीने में दबी रह जाती है और वह कह नहीं पाता। कह भी दे तो कोई उसकी बात समझ नहीं पाता। ज़रूरी नहीं कि वह बात प्यार की ही हो। प्यार ज़रूरी नहीं है; ज़रूरी है जिन्सी हविस – वह जंगली पागलपन जिसने सभ्यता के इस दौर में भी हमें सभ्य नहीं रहने दिया है। औरत और शराब, शराब और वहशत, वहशत और औरत और फिर शराब!

ज़िन्दगी एक ऐसा मर्सिया बन जाती है, जिसे आदमी ख़ुद अपनी मौत के लिए रचता है।

मौत आदमी की मंज़िल है, मौत आदमी की इंतहा है। आदमी मौत के भय से ही जंगल का जानवर बन जाता है और अन्धेरे में भागता रहता है। वह भागता है हर आवाज़ से, उजाले की हर किरण से, दिल की हर पुकार से, अपने आप से भी।

वह जगली जानवर मैं हूँ, और कोई नहीं। आदम-क़द शीशे में अपनी शक्ल देखता हूँ तो वहाँ कोई आदमी नहीं पाता, एक नंगा और पागल जानवर पाता हूँ। उसकी निगाहों में नफ़रत होती है – नफ़रत, दुनिया की हर चीज़ के लिए, सिर्फ़ नफ़रत! इस नफ़रत की दवा है शराब, शराब और औरत।

रंगमहल स्टूडियो के अपने दफ़्तर में बैठा हुआ मैं ऐसी ही बातें सोच रहा था। मेरे सामने टेबिल पर पाँव रखे हुए बैठा अमरनाथ ला-कॉरोना सिगार पी रहा था। अमरनाथ की बग़ल में बैठी नीलगिरि कभी मेरी ओर और कभी अमरनाथ की ओर अपनी बेज़रूरत मुस्कराहट फेंक रही थी। उसके जूड़े के सफ़ेद फूल उस बेहद गर्मी में मुरझा रहे थे और चेहरे का मेकअप पसीने में गीला हुआ जा रहा था। नीलगिरि का असली नाम शायद कुछ और था – मिस सिल्विया या मिस सोफ़िया, या ऐसा ही कोई और नाम। वह साँवली-सी मद्रासी लड़की थी और अमरनाथ ने यों ही उसे नीलगिरि पुकारना शुरू कर दिया था। यह नाम मुझे पसन्द आ गया था। हमने तय कर लिया कि यही नाम पुकारा जाएगा। बहरहाल, नाम में क्या रखा है? नीलगिरि ही सही!

वह पहले किसी दफ़्तर में टाइपिस्ट थी। वह हर शाम अपने दफ़्तर के नये अफ़सरों के साथ ब्लूरूम रेस्तराँ में जाती थी और मुस्कराती रहती थी। फिर वह अमरनाथ को पसन्द आ गई – मुस्कराहटों के कारण नहीं, अपने शरीर के कारण। भरे हुए शरीर में वह बेहद कुँवारी दिखती थी। चेहरे पर बच्चों की तरह भोलापन। आँखों में नशा नहीं, केवल सादगी।

कभी-कभी सादगी भी पूरी ताक़त से अपनी तरफ़ खींचती है।

अमरनाथ खिंच गया।

एक दिन वह सुबह-सुबह मेरे पास आया और बोला, “कमल बाबू, तुम्हें एक कहानी लिखनी है। मैं आदिवासियों के जीवन पर एक फ़िल्म बनाने जा रहा हूँ। तुम हफ़्ते भर में एक कहानी तैयार कर दोगे?”

“कितने पैसे दोगे, और कैसी कहानी चाहिए, मुझे बता दो। फिर कम-से-कम पाँच सौ रुपए एडवांस दे दो। कहानी तैयार हो जाएगी।” – मैंने लेखक की तरह नहीं, किसी सौदागर की तरह कहा।

मैं जानता हूँ, अमरनाथ से ऐसे ही कहना चाहिए। नहीं तो कहानी नहीं बनेगी, पैसे नहीं मिलेंगे। वैसे यह सिर्फ़ फ़िल्म प्रोड्यूसर ही नहीं, मेरा दोस्त भी है और ज़रूरत के वक़्त मदद करता है। पैसे रहें तो अच्छी शराब से इंकार नहीं करता। लाखों रुपए फ़िल्मों से पैदा कर चुका है। लाखों रुपए ऐसे धोखों में गँवा चुका है। कहता है- ‘ज़िन्दगी जुआ है और मैं दाँव पर अपनी हर चीज़ लगा सकता हूँ।’

उसने हर चीज़ दाँव पर लगा दी। उसकी बड़ी लड़की पागल होकर राँची के एसाइलम में पड़ी है। उसकी पहली बीवी ने तलाक़ ले लिया है। दूसरी बीवी अलग रहती है। पैसे लेने हों, तभी वह अमरनाथ के पास आती है। अमरनाथ किसी बात की परवाह नहीं करता। शराब और औरत, और इन सबके लिए रेसकोर्स और फ़िल्म स्टूडियो! सात नम्बर का किंग ऑफ़ होनोलूल, प्रोडक्शन नम्बर ग्यारह की फ़िल्म ‘रात बीत जाएगी’, तेज़ दौड़ने वाले घोड़े, तेज़ नशे वाली शराब, तेज़ चलने वाली फ़िल्में, तेज़ औरतें! अमरनाथ को तेज़ी का नशा है। तेज़ चलो, और तेज़! एक्सीडेण्ट की परवाह अमरनाथ नहीं करता।

उसने चेकबुक निकाली, “बेयरर चेक दे रहा हूँ। रुपए निकाल लेना। हफ़्ते भर बाद कहानी के साथ रंगमहल स्टूडियो में मिलो। मैं सोचता हूँ, हीरो के लिए रामकुमार को बुक कर लूँ। चन्दनसिंह का म्यूज़िक और फ़िरदौसी की फ़ोटोग्राफ़ी… क्यों ठीक रहेगा न?”

“हीरोइन किसे बनाओगे?” मैं पूछता हूँ, “हीरोइन जैसी होगी, वैसी ही मैं कहानी लिखूँगा। श्यामाकुमारी हीरोइन होती है तो मेरी कहानी रूप के बाज़ार के इर्द-गिर्द घूमती रहती है और कनकलता होती है तो मैं अपनी कहानी को दार्जिलिंग और आसाम की पहाड़ियों में ले जाता हूँ। कहानी को हीरोइन के आसपास रहना चाहिए ताकि फ़िल्म को अपनी एक ख़ास पर्सनैलिटी मिल सके।”

अमरनाथ कहता है, “हीरोइन होगी मिस नीलगिरि।”

“यह लड़की कौन है? किसी एक्स्ट्रा को लिफ़्ट देना चाहते हो क्या?” मुझे आश्चर्य होता है। अमरनाथ कभी ऐसी-वैसी लड़की को लिफ़्ट नहीं देता है।

“अरे वही लड़की है, जो ब्लूरूम रेस्तराँ में आती है! मद्रासी लड़की है, भरतनाट्यम जानती है। फ़िलहाल एक दफ़्तर में टाइपिस्ट है। क्यों, तुम्हें पसन्द नहीं? कल उसे मैं स्टूडियो ले गया था। आवाज़ ठीक है। फ़ोटोग्राफ़ भी अच्छे आते हैं। टेस्ट अच्छा ही रहा है। क्यों, तुम्हें पसन्द नहीं?” – अमरनाथ कहता है और फ़ोलियोबैग से नीलगिरि की तस्वीरें निकालकर दिखाने लगता है।

तस्वीरों में उसका साँवलापन और भी घना हो गया है। आँखों में सादगी नहीं, ख़ुशी की चमक है। अजन्ता की लड़कियों की तरह होठ, भुवनेश्वर की यक्षिणियों की तरह नितम्ब। हल्के कपड़ों में शरीर के चढ़ाव-उतार और भी उभर आए हैं। नीलगिरि औरत नहीं, औरत की एक बेहद ख़ूबसूरत तस्वीर है। और आज यह तस्वीर कभी मेरी ओर और कभी अमरनाथ की ओर देखकर मुस्करा रही है। रंगमहल स्टूडियो का मैनेजर अजीत बनर्जी आ गया। आते ही बोलने लगा, “कल और परसों दो दिन आप लोगों के लिए स्टूडियो-थ्री और स्टूडियो-फ़ाइव बुक करा दिया है। आप नम्बर सिक्स में शाट्स ले लीजिए। अभी आपका कौन-सा सेट चल रहा है?”

अमरनाथ चुप रह जाता है। कुछ बोलता नहीं। वह सोच रहा है। अगर ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला नहीं आया, अगर उसने फ़िनान्स नहीं किया तो कल शूटिंग नहीं हो सकेगी। रामकुमार हीरो है। उसे कल सुबह कम-से-कम तीस हज़ार रुपए एडवांस चाहिए। अगर ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला राज़ी नहीं हुआ तो? तो मिस नीलगिरि और रामकुमार की फ़िल्म, अमरनाथ की फ़िल्म, आदिवासियों के जीवन की क्लासिक फ़िल्म ‘जंगल का गीत’ नहीं बन पाएगी। अमरनाथ चालीस हज़ार रुपए लगा चुका है। अजन्ता डिस्ट्रीब्यूटर्स वाले साठ हज़ार रुपए लगा चुके हैं। अभी तुरन्त पचास हज़ार रुपए तो चाहिए ही। बाद में मध्य प्रदेश और बंगाल की टेरिटरी बिक जाएगी तब फ़िल्म पूरी हो जाएगी और रिलीज़ भी हो जाएगी। मगर अभी पचास हज़ार रुपए!

अजीत बनर्जी चला गया। टेबिल पर पाँव फैलाए अमरनाथ मन-ही-मन हिसाब लगाता रहा। नीलगिरि मुस्कराती रही। सिर के ऊपर सीलिंग फ़ैन की हवा कितनी गर्म है! दूर, स्टूडियो के मैदान में किसी फ़िल्म की आउटडोर शूटिंग चल रही है। ऐतिहासिक फ़िल्म की लड़ाई। कमर में तलवार बांधे, नक़ली दाढ़ी-मूँछें लगाए एक्स्ट्राओं की फौज यहाँ-वहाँ दौड़ रही है। कैमरामैन चीख़ रहा है, डायरेक्टर चीख़ रहा है। नक़ली ज़ख़्म खाए हुए सिपाही चीख़ रहे हैं।

तभी स्टूडियो के फाटक के सामने बड़ी-सी किंग्सवे रुकी। फाटक खोल दिया गया। गाड़ी अन्दर चली आयी। गाड़ी में बैठा हुआ मोटा सेठ ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला अन्दर चला आया। ब्रह्मदत्त पाँच जूट मिलों और दो इस्पात के कारख़ानों का मालिक है। अब पहली बार फ़िल्म में पैसा लगा रहा है। क्यों लगा रहा है? अमरनाथ ने मिस्त्रीवाला से कहा है कि मिस नीलगिरि कुल सत्रह साल की है, एकदम अनछुई, बिल्कुल फ़्रेश! मैंने भी अमरनाथ की बात की ताईद की है, हालाँकि मुझे पता नहीं! मैंने नीलगिरि को कभी ख़ास नज़र से देखा नहीं।

2

आधी फ़िल्म की शूटिंग हो चुकी है। सभी गानों के ‘टेक’ हो चुके हैं। आउटडोर पूरा हो चुका है। अमरनाथ की फ़िल्म-यूनिट के साथ नीलगिरि सुन्दरबन के जंगलों, नैनीताल की झीलों और आसाम की पहाड़ी घाटियों में जा चुकी है। वह मुस्करा देती है, और लोगों का ग़ुस्सा ठण्डा पड़ जाता है। वह मुस्करा देती है और लोगों की आग बुझ जाती है मगर, ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला?

ब्रह्मदत्त बेहद मोटा है। उसकी आवाज़ बेहद भारी है। सूट पहनता है और पगड़ी बांधता है। सिगार नहीं पीता, शराब पीता है। मैं उससे कुल दो बार मिला हूँ, और दोनों बार वह मुझे जूट और इस्पात का मालिक नहीं, किसी पवित्र हिन्दू भोजनालय का पण्डित दिखा है। इस पण्डित के आते ही अमरनाथ उछलकर बरामदे से नीचे कूद गया और बोला, “ब्रह्मदत्त! तुम गाड़ी में ही बैठे रहो। हम अभी चलते हैं, पार्क स्ट्रीट में चलकर बैठेंगे।”

बात पहले से तय थी। अमरनाथ दरवाज़ा खोलकर ड्राइवर के पासवाली सीट पर बैठ गया। मैंने पिछला दरवाज़ा खोल दिया। डरी हुई बिल्ली की तरह नीलगिरि कार के स्प्रिंगदार गद्दे में धंस गई। मैं उसकी बग़ल में बैठा। मिस्त्रीवाला ख़ुद गाड़ी चला रहा था। किंग्सवे वापस सड़क पर आ गई। सुभाष बोस स्ट्रीट, टालीगंज, रासबिहारी एवेन्यू, लैंसडाउन रोड, हैरिंग्टन रोड और पार्क स्ट्रीट। पार्क स्ट्रीट में एक बहुत बड़ा मकान है- करनानी मैन्शन। राजकपूर की फ़िल्म ‘जागते रहो’ की पूरी शूटिंग इसी एक बिल्डिंग में हुई थी। पूरी बिल्डिंग में लगभग दो हज़ार फ़्लैट हैं। आठ मंज़िल का मकान, लम्बे-लम्बे बरामदे, ऊँची सीढ़ियाँ, लिफ़्ट, कॉरीडोर, बालकनी, बरामदे, अन्धेरा, उजाला, धुँधलापन। एँग्लोइण्डियन औरतें खड़ी हैं। नीचे लगातार मोटर गाड़ियाँ। लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं। इसी मकान में ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला ने अपने लिए एक प्राइवेट फ़्लैट ले रखा है। बात पहले से तय है, पहले से तय रहती ही है। बोलने की ज़रूरत नहीं, इशारा काफ़ी है। और अभी तो शाम ही हुई है!

मुझे वह शाम याद आती है, जब आउटडोर शूटिंग के वक़्त नीलगिरि ने फ़ोटोग्राफ़र फ़िरदौसी के गालों पर लगातार तमाचे जड़ दिए थे और ख़ुद रोने लगी थी। मुझे कई शामें याद आती हैं, मगर बात पहले से तय है। मैं जानता हूँ, अमरनाथ जानता है पर नीलगिरि नहीं जानती। उसे बताया नहीं गया है।

फ़्लैट का दरवाज़ा खुल गया। मिस्त्रीवाला का ख़ास बेयरा यहाँ तैनात रहता है। हम लोग ड्राइंगरूम में बैठ गए। ड्राइंगरूम में ही एक ओर बड़ा-सा पलंग है।

पलंग एक सिम्बल है, एक प्रतीक है। नाव की शक्ल का पलंग और फ़र्श पर रंगीन पत्थरों की लहरें बनायी गई हैं। क्या यह नाव डूब जाएगी? पत्थरों में डूब जाएगी?

नीलगिरि मुस्कराती है और कहती है, “अमरनाथ भाई, मुझे प्यास लगी है। उफ़! कितनी गर्मी है!”

“अभी मँगवाता हूँ!” – सोफ़े पर नीलगिरि की बग़ल में कुछ धँसता हुआ सेठ मिस्त्रीवाला कहता है। नीलगिरि पसीने से भीग रही है। लो-कट ब्जाउज़ बदन से चिपक गया है। ब्लाउज़ के नीचे से मेंडेस की ब्रेसरी के गोल तिकोने कप झाँक रहे हैं। बेयरा कपबोर्ड से चार गिलास और स्कॉच की चौड़ी बोतल निकालकर बीच के टेबिल पर रखता है। बोतल देखकर नीलगिरि थरथराने लगती है – जैसे वह थरथराती हुई सोफ़े से फिसलकर फ़र्श पर गिर पड़ेगी। बेयरा बड़े ही अदब और प्यार से बोतल खोलकर गिलासों में बराबर-बराबर शराब डालता है। मिस्त्रीवाला कहता है, “अब प्यास बुझ जाएगी।”

और अमरनाथ कहता है, “नर्वस मत हो, नीलगिरि! यह ठर्रा नहीं, असली स्कॉच है।”

मैं किसी का इंतज़ार नहीं करता, गिलास उठाता हूँ और गले से नीचे उतार लेता हूँ। सोडा डालने की मुझे ज़रूरत नहीं है। मगर नीलगिरि? अमरनाथ की आँखें नीलगिरि से कहती हैं, “पूरे पचास हज़ार की बात है, नीलगिरि! पचास हज़ार रुपए बहुत होते हैं।”

नीलगिरि मेरी ओर देखती है, दो क्षण देखती रहती है और गिलास उठाकर पूरी शराब पी जाती है। गले में शराब जाते ही वह नीलगिरि मर गई जिसने फ़िरदौसी की, डिस्ट्रीब्यूटर श्यामलाल की और असिस्टेंट डायरेक्टर धीरज मेहता की बार-बार इन्सल्ट की थी – ठीक ऐसे ही जैसे जंगल की शेरनी हाथी के बच्चे की इंसल्ट करती है। मगर, स्कॉच के गिलास के बाद शेरनी ने कहा, “एक सिगरेट तो पिलाओ अमरनाथ!”

और, बात तय हो गई। शराब के दूसरे दौर के बाद अमरनाथ ने एग्रीमेंट के काग़ज़ अपने फ़ोलियोबैग से निकाले। ब्रह्मदत्त ने कोट की जेब से चेकबुक और फाउंटेनपेन निकाला और काग़ज़ात पर दस्तख़त हो गए। सेठ ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला फ़िल्म ‘जगल का गीत’ में पचास हज़ार रुपए लगा रहा है। कल सुबह दस बजे मिस्त्रीवाला इंडस्ट्रीज़ के पचास हज़ार रुपए अमरनाथ फ़िल्म्स के अकाउण्ट में चले जाएँगे। बात तय होते ही मिस्त्रीवाला ने बेयरा से कहा, “बाहर से दरवाज़ा बन्द कर दो। ज़रूरत होगी तो तुम्हें पुकार लूँगा।”

“हम लोग भी बाहर चले जाएँ, ब्रह्मदत्त भाई!” अमरनाथ ने पूछा।

मिस्त्रीवाला हँसने लगा। बोला, “यहाँ बैठो यार, और स्कॉच पियो। आसपास दोस्त रहते हैं तो ज़्यादा मज़ा आता है।”

ब्रह्मदत्त की इस बात पर भी नीलगिरि शरमायी नहीं। आँखें फैलाए, सोफ़े पर बाँहें खोले मुझे और अमरनाथ को देखती रही। मैं डरने लगा, मैंने कहा, “मैं बाहर जाता हूँ।”

मुझे रोकती हुई, नीलगिरि बोली, “कहाँ जाओगे जी? यहीं बैठो!”

मैं बैठा रहा। हम दोनों स्कॉच की बोतल ख़ाली करते रहे। मेरे लिए यह एकदम नयी बात थी। आदमी एकान्त चाहता है, अन्धेरा चाहत है, रहस्य चाहता है। मगर मिस्त्रीवाला? यह नीलगिरि? पार्क स्ट्रीट की यह शाम? सेठ ब्रह्मदत्त उठा और बड़े तरीक़े से हैंगर पर अपना कोट, शर्ट, टाई और ट्राउज़र डालने लगा। फिर उसने सारी बत्तियाँ बुझा दीं। सिर्फ़ जलता रहा एक नीला बल्ब। नीली रोशनी में नीली आग की तरह जलती रही नीलगिरि। वह चुपचाप बैठी रही बाँहें फैलाए, गीत गुनगुनाती हुई – जंगल का गीत, आदिम गीत।

ब्रह्मदत्त ने कहा, “कपड़े उतार डालो, नीलू। क्रीज़ मसक जाएगी।”

“नहीं!” – नीलगिरि ने कहा और हमारी ओर देखती हुई मुस्कराती रही।

मैं डरता रहा। अमरनाथ हाथ में गिलास लिए हुए शरमाता रहा। ब्रह्मदत्त पास आ गया। उसने अमरनाथ का गिलास छीन लिया और एक ही साँस में ख़ाली कर दिया। फिर वह सोफ़े की ओर मुड़ा। वह अण्डरवियर-बनियान पहने था। नीलगिरि वैसे ही बैठी थी मुस्कराती हुई, बाँहें फैलाए। दोनों हाथों से उसने सोफ़े को कसकर पकड़ रखा था। मिस्त्रीवाला ने कहा, “पलंग पर चलो नीलू, यहाँ तुम्हें तकलीफ़ होगी।”

“नहीं”, नीलू ने कहा, और हमारी ओर देखती हुई मुस्कराती रही जैसे वह स्टूडियो के सेट पर हो और द्रौपदी चीरहरण की शूटिंग में हिस्सा ले रही हो, जैसे वह द्रौपदी नहीं, कृष्ण हो, कृष्ण भी नहीं, दुश्शासन हो। वह नीलगिरि नहीं, दुश्शासन है और ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला, द्रौपदी है। नाटक उल्टा चल रहा है। शूटिंग ग़लत हो रही है। डायरेक्टर चीख़ना चाहता है, ‘कट करो, शूटिंग रोक दो’ मगर गले से आवाज़ नहीं निकल रही है। अमरनाथ चुपचाप अपने गिलास में स्कॉच डाल रहा है। नीलगिरि मुस्कराए जा रही है।

मिस्त्रीवाला को अचानक बहुत गर्मी महसूस हुई। चालीस साल का अधेड़ राक्षस ब्रह्मदत्त मिस्त्रीवाला, सत्रह साल की परियों की राजकुमारी नीलगिरि! नाटक उल्टा चल रहा है। शूटिंग ग़लत हो रही है। डायरेक्टर के गले से आवाज़ नहीं निकल रही। ऐसा क्षण आ गया है जब आवाज़ सीने के अन्दर ही गूँजती-तड़पती रह जाती है, बाहर नहीं निकल पाती। कोई कुछ बोल नहीं पाता। बोलने की ज़रूरत नहीं है। हवा रुक गई है, मौसम थम गया है, आवाज़ें और वक़्त, और यह ज़िन्दगी पार्क स्ट्रीट के एक मकान के एक बन्द कमरे में रुक गई है।

नीलगिरि खिलखिलाने लगती है, जैसे दुनिया की हर बात से बेफ़िक्र बच्चे खिलखिलाते हैं। ब्रह्मदत्त उसकी ओर बढ़ता है मगर नीलगिरि की पीठ सोफ़े की दीवार से जुड़-सी गई है।

प्यार आसान नहीं, वहशत आसान है, जंगली जानवर बनना बहुत आसान है।

नीलगिरि अपना बचाव नहीं कर रही। वह अचानक चुप हो जाती है, पत्थर की तरह सख़्त हो जाती है, सिकुड़ जाती है और ठण्डी पड़ जाती है – जैसे मर चुकी हो। जैसे नीलगिरि नहीं, मिस्त्रीवाला की गोद में एक लाश है, एक पत्थर की मूरत, अजन्ता या भुवनेश्वर या खजुराहो की प्रस्तर मूरत। मैं शर्म से मर चुका हूँ और अमरनाथ पचास हज़ार रुपयों में मर चुका है। रात हो गई है – काली रात, मौत जैसी रात!

तभी एकाएक नीलगिरि आँखें खोल देती है और रेशम के गोले की तरह मिस्त्रीवाला की गोद से नीचे फ़र्श पर फिसल पड़ती है। फिसल पड़ती है और मुस्कराती हुई बड़े प्यारे लहजे में कहती है, “धूर्त! बस इतनी ही मर्दुमी रखते हो?”

ब्रह्मदत्त सोफ़े से नीचे उतरने की कोशिश करता है मगर उसके पाँव थरथराने लगते हैं। वह नीलगिरि का हाथ खींचना चाहता है। मगर वक़्त बीत गया है और ‘जंगल का गीत’ फ़िल्म के दस्तावेज़ पर दस्तख़त हो चुके हैं!