सब कुछ बाज़ार का हिस्सा है
ख़रीदी जा रही हर चीज़ के बदले
चुकायी जा रही है एक क़ीमत

किस स्वेटर में कितनी गर्माहट हो
यह ग्राहक को लग रही ठण्ड से नहीं
स्वेटर की क़ीमत से तय होगा

चक्कर खाकर सड़क पर गिर गये आदमी को
उठाकर रख दिया जाता है डिवाइडर पर
अभी क़ानूनन
उसको कुचलकर बढ़ना वैध नहीं है
अंधेरे या कोहरे में किया जा सकता है यह काम

आदमी के सड़क पर गिर जाने से रुक जाती है सड़क
मन्द पड़ जाती है अर्थव्यवस्था की रफ़्तार

हमारे व्यवहार से विस्थापित होकर
शेयर बाज़ार के सूचकांक में घुस गयी है
सारी संवेदना

बाज़ार के नये क़ायदे के अनुसार
उधार उस बड़ी दुकान के लिए है
जो और बड़ी होकर लील जाना चाहती है
ठेले का अस्तित्व,
दुत्कार उसके लिए
जिसकी ख़रीद-क्षमता से महँगी है चीज़

हमारी अधिकांश ज़रूरतें बाज़ार की देन हैं
“ज़रूरतमंद को कितना मिला?”
यह प्रश्न मिटा दिया गया है
बाज़ार की प्रश्नावली से

जीने का जुमला बदल गया है
प्रतिस्पर्धा, दौड़ या जीवन में बने रहने के बजाय
लोग यह कहते हैं—
“ज़िन्दा रहने के लिए बाज़ार में बने रहना ज़रूरी है!”

बाज़ार का हँसना लाज़िम है!

'साँझ होती है ठीक उसी की तरह सुन्दर'

किताब सुझाव:

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