बेदार लम्हा सरे दीवारों से कह रहा है।
सुनो दीवारों,
अगरचे ये वक़्त एक लम्बे अरसे से चल रहा है,
और इस सफ़र में किसी को ग़म तो किसी को खुशियाँ दिला रहा है,
तो इसका दामन सियाह रंग से रंगीन क्यूँ है
क्यूँ इसके बाजू टूटे हुए एक शाख के जैसे ख़ामोश पड़े है।
कोई बताए ये वक़्त का जो अभी का वक़्त है
क्या ये अज़ल से यही रहा है।
अगर रहा है, और सब सही है तो मेरे वूजूद के मानी क्या हैं?
क्यूँ मेरे दर पे कटी हुई एक पर को ले के एक तितली पड़ी हुई है।
क्यूँ इस जहाँ के पुराने ज़ख्म हरे ही रंग से रंगे हुए हैं।
क्यूँ उन चराग़ों से जलकर के पुराने ख़त के पुराने लम्हें मरे पड़े है।
अगर ये सच है तो कैसा सच है, अगर सही है तो क्या सही है?
मेरे ही दर पे, मेरी ही दस्तक से मैं ही इतना डरा हुआ हूँ,
मुझे अकेले हसीन लम्हे की इंतिज़ारी नसीब क्यूँ है,
मुझे तीरगी नसीब क्यूँ है, मुझे उदासी नसीब क्यूँ है।

आरिज़ों पे तेरे जो सूखे आंसू टहल रहे हैं,
ये कैसे आंसू के जिनमें कोई नमी नहीं है।
बेदार लम्हा जो एक अरसा थमा हुआ है,
उसे बताओ, के तुमको जिससे दिलकशी थी,
वो अब किसी के बदन की ख़ुशबू में पल रहा है।
उसे ना छेड़ो, वो अब हसीं सा बन गया है,
वो अपने माजी को याद करके पुराने लम्हें जीता नहीं है।
बेदार लम्हा अभी ज़रा-सा खमोश होकर टहल रहा है।
बेदार लम्हा अभी यहीं था, बेदार लम्हा अभी नहीं है।

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