जब थी जरूरत,
उठी नहीं एक बार भी हूक।
अब समय ही न शेष रहा,
तब जगी है मंजिल पाने की भूख।

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आशुतोष पाणिनि
कवि, पर्यावरण-प्रेमी, भेषज-विज्ञानी, लोक-स्वास्थ्य एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ।

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