मैं एक लम्बी कविता लिखूँगा मेरे दोस्त
इस कविता में मैं तुमसे सवाल करूंगा
ज़िन्दगी के बारें में
और बताऊँगा… मैंने ज़िन्दगी को कितना समझा
मैं प्रश्न करूंगा
इस बारे में कि
क्या नौकरी पा लेना ही ज़िन्दगी है
मैं तुमसे ये भी पूछूंगा
क्या सच में ज़िन्दगी जीना उसके बिना मुश्किल है..
जिसके चले जाने से तुम इतना व्याकुल हो
क्या यहॉं जीने के लिए
एक खीसनिपोर चलाक बनना ज़रूरी है
क्या सच में नैतिकता, सत्य, चरित्र
सब कहनें की बातें है
मुझे ये भी समझाना मेरे दोस्त…!!
सत्य और नैतिकता में पड़ा रहना कहीं सही में?
बेवकूफी तो नहीं?

मैं अपनी कविता को,
स्त्रीलिंग और पुल्लिंग में नहीं बाटूँगा
बगैर… करता/करती है… के ही
तुम समझ लेना, मैं तुमसे ही बात कर रहा हूँ…

मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ
पिछली बार तुमने कब?
ज़िन्दगी जी थी मेरे दोस्त
खैर मैं, अपनी सुनाता हूँ…

मैंने ज़िन्दगी को
कड़ी दुपहरी में उस बरगद के चबूतरे पर दो घड़ी दम मार के जी है
मैनें ज़िन्दगी उस दोपहरी, बाग में खाट पर एक बेहोशी वाली नींद के बीच जी है
मैंने ज़िन्दगी सर्दियों में मखमली घास पर गुनगुनाती धूप के आगोश में दोस्तों के महफिल के बीच जी है

मैनें ज़िन्दगी गर्मियों की शीतल रात में छत पर चाँद तारों के बीच जी है
मैनें ज़िन्दगी को उस गुदगुदी के रूप में जिया है जो सुबह खेतों की पगडण्डियों पर ओस वाली घासों ने मेरे पैरोंं में की थी
मैनें ज़िन्दगी को सर्दियों की दुपहरी छत पर माँ की चम्पी के साथ भारी होती, अलसायी पलकों के बीच जी है
मैं सोचता हूँ तो समझ पाता हूँ
मैं अक्सर ज़िन्दगी जीता था
घर पर जब मैं रहता था…
अब मुझे याद आता है… मैंने तो हजारों तरीके से ज़िन्दगी जी है
अब मैं समझ पाता हूँ… वो अम्मा की कहानियों के बीज कौतूहल तो थी ज़िन्दगी
वो दो बिस्कुट के टुकड़ों के मिल जानें की प्रफुल्लता तो थी ज़िन्दगी

ऐसा नहीं है कि अब नहीं जीता ज़िन्दगी
बस थोड़ा मुश्किल हो गया है
आज भी जब घाट पर
भागती जनसंख्या में खुद को थिर पाता हूँ
थोड़ा जी आता हूँ
आज भी जब मोबाइल को दूर रख खुद को एकान्त में ले जाता हूँ
तो थोड़ा जी पाता हूँ
सुबह छत पर, जब ताजी हवा से मुंह पर थपकी खाता हूँ
थोड़ा जी पाता हूँ
भले ही इस दौर में जीवन को समझना मुश्किल हो रहा हो
मगर ज़िन्दगी रोज तो आती है
रोज शाम को
जब माँ का फोन आता है…