‘Beti Ki Maa’, a poem by Poonam Sonchhatra

हम चार बहनें हैं
हाँ हाँ
और एक भाई भी है
सही समझा आपने
भाई सबसे छोटा है

लेकिन हम बहनें सौभाग्यशाली रहीं
क्योंकि बेटे की चाह
मेरे पिता और उनके परिवार को न होकर
मेरी माँ को थी
और मेरे पिता अपनी पत्नी के प्रेम में
केवल उसकी ख़ुशियाँ चाहते थे
किसी भी क़ीमत पर

कहते हैं
“माता-पिता की के कर्म और कर्ज़
संतानें चुकाती हैं”

इसलिए मेरी माँ की चाहत और ख़ुशियों की क़ीमत
हमने भी चुकायी
और घर की सबसे बड़ी संतान होने के नाते
मैंने थोड़ी अधिक चुकायी…

लेकिन मेरे पिता ने
हम बहनों को इस तरह पाला
कि हमें कभी
अपने लड़की होने पर अफ़सोस न हुआ…

मेरी उड़ान को पंख मिले
कल्पना को क़लम
क़दमों को रास्ता
और सोच को अभिव्यक्ति…

मैं नहीं जानती
जिन लड़कियों को ये सब नहीं मिलता
उन पर क्या बीतती है
मैं केवल और केवल
उसकी कल्पना भर कर सकती हूँ…

लेकिन इन बातों ने भी
कभी मुझे नहीं तोड़ा
मुझे हमेशा यह लगा
कि वे लड़कियाँ साहसी क्यों नहीं….?

क्यों वे लड़ती नहीं…?
परिस्थितियों को यथारूप स्वीकार कर लेना
मेरी दृष्टि में
सदैव एक कायरता के तुल्य रहा है…

शायद… शायद ये सदैव और सबके लिए सच न भी हो
लेकिन मैंने जीवन के प्रत्येक पल में
अपने सपनों के लिए एक जंग लड़ी है
आज भी लड़ रही हूँ…

लेकिन जो बात अब तक गर्व थी
आज… अब खटकने लगी है..
“मैं एक बेटी की माँ हूँ…”

नहीं… नहीं…
मुझे उसके बेटी होने से नहीं
ख़ुद के एक बेटी की माँ होने को लेकर भय व्याप्त है..

एक संशय सदैव मेरे मन में रहता है
मुझे घबराहट होती है
जब कोई भी… हाँ कोई भी
उसे छूता है…
उसे पल भर अकेला छोड़ने में
मेरी रूह काँपती है…
उसकी भोली बातें
सहज ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं
अब ये बात
मुझे किसी दुर्गुण की तरह प्रतीत होने लगी है..

जिस समाज में एक महीने की बच्ची से लेकर
नवयौवना तक
और एक नवयौवना से लेकर एक वृद्धा तक
केवल एक देह हो..
मुझे उसके कोरे मन और कोमल भावनाओं
को लेकर टीस उत्पन्न होती है..

मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ
कि उसे आत्मनिर्भर बना सकूँ
सही और ग़लत समझा सकूँ
लेकिन वो मेरी ज़िम्मेदारी है..
आख़िर मैं कब तक उसकी ढाल बन सकती हूँ…?
आज ही पढ़ा
कि दहेज का राक्षस सिर्फ़ संविधान में ही मारा गया है..
एक बेटी फिर इसलिए मार दी गयी
क्योंकि पति को दहेज में स्कार्पियो नहीं मिली थी..!

मैं देश की सारी जनता की तरह
केवल रोष व्यक्त कर सकती हूँ..
कैंडल मार्च का हिस्सा बन सकती हूँ..
बहुत हुआ तो
दो-चार कविताएँ अपनी वाॅल पर डाल सकती हूँ…
न्याय की माँग करते हुए
सड़कों पर नारे लगा सकती हूँ..

लेकिन हक़ीक़त यही है कि
दुनिया का कोई न्याय
उस बच्ची को वापस नहीं ला सकता…
उसे उसकी वह ज़िंदगी नहीं लौटा सकता
जो अभी उसे जीनी थी…

कभी पढ़ा था…
Prevention is better than cure….

स्वर्ग और नर्क जाने किसने देखे..?
क्या ईश्वर के न्याय की तरह
सत्ता के त्वरित न्याय का भय व्याप्त किया जा सकता है…?

सच कहती हूँ
मैं एक बेटी की माँ होने की
ख़ुशियाँ मनाना चाहती हूँ…

यह भी पढ़ें:

जय गोस्वामी की कविता ‘माँ और बेटी’
सारा शगुफ़्ता की नज़्म ‘शैली बेटी के नाम’

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