बेटी, ऊपर वाले का दिया नायाब सा एक तोहफा है,
मिलता भी ये उसको है, जो इसके लायक होता है,
अक्ल के मारे लोगों को, ये बात समझ ना आती है,
कि बेटी भी वो अंग है, जो समाज का हिस्सा होता है,
समाज के कुछ ठेकेदार, जब बेटा बेटी में फर्क बिठाया करते हैं,
उस वक्त जन्म देने वाली एक मां की भावनाओं का शोषण होता है,
बेटी बचाने के लिए आये दिन न जाने कितने ही झगड़े होते हैं,
बलात्कारियों के खिलाफ सड़कों पे ‘कैंडल मार्च’ भी तगड़े होते हैं,
फिर भी बदनसीब उस बेटी का ‘कत्ल’ भ्रूण में होता है,
कहीं पे पूजी जाती काली, कहीं दुर्गा पूजन होता है,
पर जो घर की लश्चमी को ना समझे, वो सच में बदकिस्मत होता है,
समझ सको तो समझ लो इसको, बेटी ही वो ज़रिया है,
जिसके कारण पुरुष का अस्तित्व इस धरती पे होता है…

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