एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं
जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है
और बेतहाशा चलती चली जाती है
समय की किसी अज्ञात दिशा में

मैं सवार हूँ इस ट्रेन पर बेटिकट यात्री की तरह
अपने होने के वज़न को बमुश्किल सम्भाले हुए
सबसे नज़रें बचाकर
ट्रेन की खिड़की के बाहर
गुज़रते दृश्य देख रहा हूँ

एकाएक नज़र फिराता हूँ तो पाता हूँ
सामने की बर्थ पर तुम हो
नींद में गुम, मुझे ओझल बने रहने की मोहलत देती हुई
तुम्हें देखती मेरी आँखें पहली बार
संकोच और भय और ग्लानि के परे हैं
देखने की सम्पूर्ण पवित्रता में सम्पन्न

ऐन इसी वक़्त मुझे खटका होता है
टिकट कलक्टर की आमद का
मैं ट्रेन की ज़ंजीर की ओर देखता हूँ
फिर तुम्हारी ओर—
तुम्हारी आँखें खुलती हैं
मैं देखने लगता हूँ बाहर दोबारा
अपने होने के वज़न को बमुश्किल सम्भाले हुए

तुम्हारा स्टेशन आने को है…