भला आदमी

‘Bhala Aadmi’, Hindi Kavita by Nirmal Gupt

वह एक भला आदमी था
चुपचाप चला गया
अपनी देह से बाहर
बिना चप्पल पहने
हालाँकि कुछ पल पहले ही
उसने अपने से कहा था-
‘यार बड़ी भूख लगी है’!

वह एक भला आदमी था
जिसे कभी न ढंग से जीना आया
और न क़ायदे से मरना
ऐसे चला गया जैसे
कोई झप्पर से बाहर आये
मौसम का मिज़ाज भाँपने

वह एक भला आदमी था
ज़िंदा रहने की ललक कहें या मजबूरी
उसे लगातार पता लगता रहा कि
जीने के लिए बार-बार मरना होता है
फिर भी जीने लायक़ पुख़्ता जगह
शायद ही कभी मिल पाती है

वह एक भला आदमी था
उसके तकिये के नीचे से मिले हैं
कुछ हस्तलिखित पन्ने
जिनकी इबारत कविता जैसी दिखती है
लोग सशंकित हो उठे हैं
वह जितना दिखता था
उतना भला तो नहीं था

वह एक भला आदमी था
अपनी निजता सम्भाल नहीं पाया
ठीक-ठाक तरीक़े से
उसके बारे में उठ रहे हैं सवाल
वह यूँ क्यों चला गया दबे पाँव
इस तरह भी कोई जाता है भला!

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