हमारी आठवीं की उस संस्कृत कक्षा में तैरा करते थे
शब्द रूप और धातु रूप

खिड़कियों पर लटके रहते थे
हलंत और विसर्ग के कड़क नियम
जिन्हें उछलकर लपक लेती थी दो चोटियों वाली ज़ुबैदा ख़ान

उसके होंठ टाइपराइटर के खटकों की तरह
उगलते थे खट-खट संस्कृत के श्लोक

जब मैं रट रही होती पढ़ती-पढ़त-पढ़न्ती और
जूझ रही होती इकारान्त और उकारान्त के भीतर कहीं,
वो संस्कृत की गूढ़ वीथिका में बर्फ़-सी जमी रहती
एकलव्या हो बाँच डालती
भवभूति का काव्य और पाणिनि के सूत्र

पर मुझे आश्चर्च है?

इन काव्यों और सूत्रों ने नहीं की कोई नौटंकी
विस्फोट-धरना या प्रदर्शन उसके ख़िलाफ़?
और न ही पूछा कभी उसका गली-मुहल्ला?

क्या ये भाषा नहीं जानना चाहती थी ज़ुबैदा ख़ान की प्रार्थना वाली मुद्रा
और उसके घर में पकने वाली रोटियों का रंग?
उसे सीखने से पहले

भाषा हमारे सरनेम की जासूसी कभी नहीं करती क्योंकि
भाषा का कोई सरनेम नहीं होता।

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