जब मुझे पता नहीं होता कि
मेरी मंज़िल क्या है तो
मैं एक भीड़ का,
हिस्सा हो जाती हूँ।
भीड़ भी हिस्सा होती है
उसी सभ्य समाज का
जहाँ आरक्षण के लिए
बसें जलाई जाती है
माँगे मनवाने के लिए
रेलें रोकी जाती हैं
जहाँ धर्मान्धता में
नृशंस हत्याएँ की जाती हैं
जहाँ संस्कृति की आड़ में
नोच दिए जाते है पंख
ओढ़ा दिए जाते हैं लबादे
नख से शिख तक
जहाँ साँस भी नहीं ले पाती
सम्वेदनाओं की आस
जहाँ आँखों में तैर जाती
अधखिले सपनों की लाश।
और उस लाश को ढोते-ढोते
हम भी हो जाते हैं
उस भीड़ का हिस्सा
जो कभी किसी की रही ही नहीं
हम मूकदर्शक हैं
तमाशाई हैं,
हँसते हैं
चिन्ता जताते हैं,
टिप्पणियाँ करते हैं
क्योंकि मूकदर्शकों के देश में
तमाशों की कमी नहीं होती।

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