भूख

‘Bhookh’, a poem by Deepak Jaiswal

भूख के मरते ही मर जाता है आदमी
बहुत भूख से भी मर जाता है आदमी

मरता तो तब भी है
जब वह सिर्फ़ अपने लिए जीने लगता है
जब दुनिया में कहीं कोई आदमी भूख से मरता
उस समय हर वह आदमी जिस की आँख में पानी मरा नहीं
थोड़ा सा मर जाता है…
मरने को तो मर गया सिकन्दर भी, हिटलर भी
गाँधी भी, नार्मन बरलॉग भी, टॉलस्टाय भी, मर्लिन मुनरो
और आरकेस्ट्रा वाली मुनिया भी
पर इनके भूख में अंतर था
मरने में अंतर था…
तय है कि हम सब मरेंगें
मर जायेगा जेम्स बॉण्ड भी…
हम इस नियति को बदल नहीं सकते
पर हम तय ज़रूर कर सकते हैं
मरने के तरीक़े को…
कि कौन सी भूख हमें ताउम्र घसीटे चलेगी

बहुत ख़ुशक़िस्मत हैं जो आप पढ़ सकते हैं
सोच सकते हैं और तय कर सकते हैं
अपनी पसन्द की भूख को…
जानते हैं अंतड़ियों के सूखते हुए मरना कैसा होता है
अपने बच्चे को अपनी गोद में भूख से मरते हुए देखना कैसा होता है
कभी सोचते हैं इनकी ज़िम्मेदारी किन पर है
यदि नहीं तो आप मर चुके हैं…

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