बोझ

‘Bojh’, a poem by Pratima Singh

साहिलों ने चीख़कर रोका
समंदर सिकुड़ रहा है
लहरों ने इल्तिज़ा की
नाव ज़मीनों पर ले जाओ
टूटी-सी उस नाव में
महज़ हम तीन ही थे
मेरी साँसें, उसकी नज़र
इक सिक्का मेरे इश्क़ का
बेकरवट, सीधा, शून्य निहारता
कभी-कभी सबसे हलकी चीज़ों का बोझ,
उठाए नहीं उठता।