‘एम. एफ़. हुसेन – कला का कर्मयोगी’ से

एम. एफ़. हुसेन अकेले ऐसे भारतीय चित्रकार हैं जिनके बारे में सबसे अधिक लिखा और बोला गया है। जिनके व्यक्तिगत जीवन और कलाकर्म से अधिकांश कलाप्रेमी अवगत हों, उन पर लिखना दुश्वार-तरीन काम है। उनका आकर्षक व्यक्तित्व और ख़बरों में रहने की कला ने उन्हें कलाकार और ग़ैर कलाकार दोनों में समान रूप से प्रसिद्ध कर दिया। वे भारतीय आधुनिक चित्रकला का चेहरा बन गए।

आम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी कला के बारे में अधिक नहीं जानता है और उसकी दृष्टि में किसी पेंटर के पेंटर होने का अर्थ आमतौर पर साइनबोर्ड पेंटर होने से अधिक नहीं होता। लेकिन अपने वास्तविक कार्य का परिचय देने के लिए विस्तार से समझाने की बजाय हुसेन का हवाला भर देना काफ़ी होता है। अवाम में हुसेन आधुनिक कला की परिभाषा की हैसियत रखते हैं। हुसेन के आधुनिक और स्टाइलिश रहन-सहन के अंदाज़ ने कला के साथ ग्लैमर को जोड़ दिया। वे अकेले ऐसे चित्रकार रहे हैं जिनकी लोकप्रियता किसी फ़िल्मी कलाकार से कम नहीं थी। उन्हें देखने, उनसे मिलने, उनके साथ फ़ोटो खिंचवाने और उनके ऑटोग्राफ़ लेने की उत्सुकता आम व्यक्ति के साथ-साथ चित्रकारों में भी होती थी। यूँ तो कई और चित्रकार हैं जिनका भारतीय कला जगत में उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान है लेकिन उनकी लोकप्रियता कला की देहलीज़ से बाहर नहीं जा सकी। आम आदमी उनके नाम और काम से कम ही परिचित है।

एक समय था जब मध्यम वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक के परिवार को अपने बच्चों का कला में कोई भविष्य दिखायी नहीं देता था, बल्कि चित्रकार की छवि एक परेशानहाल व्यक्ति की तरह होती थी लेकिन हुसेन, रज़ा, आरा, सूज़ा, गायतोंडे और बेंद्रे जैसे कलाकारों का समूह कला को कलादीर्घा तक लेकर आया और नेता और अभिनेता के कहानी क़िस्सों से भरे पड़े अख़बारों और पत्रिकाओं में कला के लिए भी जगह बनायी। दूसरे साथी कलाकार तो पूरी तन्मयता से कलाकर्म में लीन हो गए और कला परिदृश्य में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान भी हासिल किया लेकिन हुसेन की कला स्टूडियो और कैनवास तक सीमित नहीं रही।

हुसेन अन्य कलाकारों की भाँति बंद स्टूडियो में कला को रहस्य की तरह रचने में विश्वास नहीं करते थे। वे गाहे-बगाहे किसी आर्ट गैलरी में, तो कहीं खुले स्थान पर आम जनता के सामने भी पेंटिंग किया करते थे। इस प्रकार हुसेन ने कला को स्टूडियो से ही नहीं, आर्ट गैलरी की साफ़ शफ़्फ़ाफ़ दीवारों से भी बाहर निकाला, गोया ये संदेश दिया कि चित्रकला एक वर्ग विशेष के लिए, नहीं बल्कि सबके लिए है। अगर आम व्यक्ति कला का विषय हो सकता है तो कला आम व्यक्ति के लिए क्यूँ नहीं हो सकती! ये बात अलग है कि हुसेन की कलाकृतियों को ख़रीदना और अपनी दीवारों की ज़ीनत बनाना केवल धनवानों के बस की बात है।

हुसेन ने अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी कला को भारतीय कला बाज़ार में सबसे अधिक महँगा बनाया लेकिन अपने उदार स्वभाव के कारण कई परिचितों, प्रशंसकों और मित्रों को अपनी बेशक़ीमती पेंटिंग्स और ड्रॉइंग्स खुले हाथों उपहार के तौर पर बाँटते रहे। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण हुसेन कलाप्रेमियों के दिलों में भी रहे और अख़बारों की सुर्खियों में भी। हुसेन की कृतियों को ख़रीदना चाहे आम व्यक्ति की ताक़त से दूर हो मगर अपने फ़क़ीराना स्वभाव के कारण वे स्वयं आम व्यक्ति की पहुँच से कभी दूर नहीं रहे।

अपने लड़कपन की यादों के शहर इंदौर से हुसेन का रिश्ता हमेशा बना रहा। उनके इंदौर प्रवास के दौरान एक बार मेरे एक कलाकार मित्र सलीम ने उन्हें सुबह-सुबह बम्बई बाज़ार स्थित आगरा होटल में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए देखा। ऐसे महान चित्रकार को अपने मुहल्ले की एक छोटी-सी होटल में देखकर आश्चर्यचकित इस युवा कलाकार ने हुसेन साहब से निकट ही स्थित अपने छोटे से वर्कशॉप पर आने की इल्तिजा की और उनकी अपेक्षा के एन ख़िलाफ़ हुसेन उनके साथ हो लिए। उस समय फ़ोटोग्राफ़ी आज की तरह आसान नहीं हुआ करती थी और इतनी जल्दी किसी फ़ोटोग्राफ़र को बुलाना भी सम्भव नहीं था, लिहाज़ा सलीम को इस बात का आज तक दुःख है कि उस अविस्मरणीय क्षण का कोई चित्र उनके पास नहीं है। ठीक वैसे ही दुबई में रहने वाले मेरे एक और निकटतम परिचित हातिम शाकिर को दुबई के बाज़ार में हुसेन साहब घूमते हुए दिखायी दिए। हालाँकि इस शख़्स का कला से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है लेकिन हुसेन और हुसेन के महत्त्व को अवश्य जानते थे। वे उत्सुकतावश हुसेन से मिले और बातचीत से पता चला कि हुसेन साहब को क़ीमा खाने की इच्छा यहाँ बाज़ार ले आयी है। मौक़े को ग़नीमत जानकर इस हुसेन प्रेमी ने होटल की बजाय क़रीब ही मौजूद उसके घर पर क़ीमा खाने की दावत दी। इस शख़्स को यक़ीन था कि ये बात सम्भव नहीं है लेकिन उनकी बेयक़ीनी को हैरत में बदलते हुए हुसेन साहब ने बख़ुशी दावत को स्वीकार किया और उनके साथ उनके घर पहुँच गए। क़ीमा लाने, बनाने और उनके सामने परोसने तक के लिए एक लम्बा समय का दरकार था और हुसेन साहब इतना समय एक ऐसे अजनबी हिंदुस्तानी के घर बैठे रहे जिसका कला से कोई वास्ता नहीं था। हुसेन साहब की यही विनम्रता उनको बड़ा बनाती है और वास्तव में बड़ा व्यक्ति वही है जिससे मिलकर दूसरा अपने आप को बड़ा महसूस करने लगे। इस सच्चाई के बावजूद कि हुसेन साहब इतने लम्बे समय तक उनके घर मौजूद रहे, उन्हें आज भी अविश्वसनीय-सा प्रतीत होता है कि भारतीय आधुनिक कला का पितामह कभी उनका मेहमान रह चुका है। हुसेन अपने जीवनकाल में ही जीवित किंवदंती हो गए थे।

चित्रकला में अंतरराष्ट्रीय ख्याति और समस्त सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान पाने के बावजूद हुसेन अपने पुराने रिश्तों और बचपन के साथियों को कभी भूले नहीं। हुसेन अपनी 75वीं सालगिरह मनाने के लिए एक स्थानीय संस्था के आमंत्रण पर इंदौर आए हुए थे। इंदौर के एक हिन्दी समाचार पत्र के सम्पादक और हिन्दी-मराठी के जाने-माने लेखक प्रभाकर माचवे हुसेन साहब के पुराने जानने वाले थे। चूँकि इस समाचार पत्र से मैं स्वयं भी जुड़ा था, माचवे साहब ने हमारे माध्यम से एक शाम हुसेन को अपने घर पर चाय के लिए आमंत्रित किया और हुसेन साहब ने निमंत्रण स्वीकार भी किया। वादे के अनुसार शाम को समाचार पत्र के मालिक की ओर से उनके ड्राइवर के साथ मैं और मेरे एक मित्र शकील अख़्तर हुसेन साहब को लेने देवलालीकर कला वीथिका पहुँचे तो अपने निर्णय के लिए माफ़ी तलब करते हुए माचवे साहब के घर न आने की विवशता ज़ाहिर की। दरअसल हुसेन को उनके बचपन के मित्र और सहपाठी मिठ्ठू लाल गर्ग की ओर से रात्रि भोज का निमंत्रण आ गया था। अपने मित्र के घर जाने को वे इतने उत्साहित थे कि वादे के बावजूद माचवे साहब के यहाँ जाने का इरादा तर्क कर दिया। ये हुसेन थे जिन्होंने एक महत्वपूर्ण व्यक्ति की दावत पर एक निर्धन मित्र को अधिक महत्त्व दिया। कला की सोहबत ने उन्हें अधिक उदार और मानवीय मार्मिकता से भर दिया था।

हुसेन का बचपन इंदौर में छावनी की पारसी कॉलोनी में बीता। मुहल्ले के अन्य मित्रों में से एक अब्दुल वहीद के साथ उनकी मित्रता बहुत गहरी रही। मित्रता के इस सम्बन्ध को उन्होंने हमेशा बनाए रखा। इंदौर जब भी जाते, मिलने वालों की सूची में सबसे ऊपर अब्दुल वहीद साहब का नाम ही होता। रानीपुरा स्थित ताज स्टूडियो पर वे उनसे मिलने अवश्य जाते। अब्दुल वहीद जब तक जीवित थे, हुसेन ने दोस्ती का रिश्ता और मुलाक़ात का सिलसिला बाक़ायदा बनाए रखा। अब्दुल वहीद के बाद भी उनके चित्रकार बेटे अब्दुल क़ादिर से उनका आत्मीय सम्बन्ध बना रहा। दुर्भाग्यवश अब अब्दुल क़ादिर भी हमारे बीच नहीं रहे। अब्दुल वहीद के एक सुंदर लाईव पोर्टेट के अलावा हुसेन ने अब्दुल क़ादिर के बेटे का नामकरण भी अपने हुसेनियत वाले अंदाज़ में ही एक ड्राइंग पेपर पर उर्दू में लिखकर किया। उन्होंने क़ादिर के बेटे का नाम नादिर रखा। हमारी एक सामूहिक प्रदर्शनी के दौरान अपने इसी मित्रपुत्र के महज़ एक फ़ोन पर हुसेन साहब एक महिला मित्र ‘इला पाल’ के साथ जहाँगीर आर्ट गैलरी आए और गर्व से अपनी अटूट मित्रता का हवाला देते हुए उनसे परिचय करवाया।

जितनी महान हुसेन की चित्रकला थी, सुर्ख़ियों में बने रहने की उनके पास उतनी ही विचित्र कला भी थी। फ़नकार नामक एक संस्था ने इंदौर में हुसेन साहब का जन्मदिन बड़े स्तर पर मनाने के लिए उन्हें आमंत्रित किया और हुसेन की स्वीकृति के बाद भव्य स्तर पर उनके आवभगत की तैयारियाँ आरम्भ कर दी गईं। जिस दिन हुसेन साहब को इंदौर पहुँचना था, ठीक उसी दिन उन्होंने आने से अचानक इंकार कर सबको चौंका दिया, कारण था इंदौर में एक दिन पहले साम्प्रदायिक तनाव होना। हुसेन के इस साम्प्रदायिक तनाव को लेकर दुःखी होने और विरोध स्वरूप इंदौर आने और जन्मदिन मनाने से इंकार के फ़ैसले की घोषणा उनके बड़े बेटे शफ़ाअत हुसेन ने लाल बारा में बड़ी तादाद में उपस्थित और बहुप्रतीक्षित कलाप्रेमियों के बीच की। इस घोषणा से जहाँ आयोजकों के चेहरे उतर गए, वहीं उनके प्रशंसकों में निराशा छा गई। आयोजकों की बड़ी मन्नत समाजत के बाद अन्ततः हुसेन इंदौर आए और योजनानुसार सारे कार्यक्रम भी हुए मगर अगले दिन अख़बारों की सुर्ख़ियाँ हुसेन के आने से अधिक अचानक न आने के फ़ैसले की थीं।

पता नहीं विवादों में बने रहना हुसेन साहब की स्वभाविक विवशता थी या रचनात्मक ज़रूरत लेकिन उनकी हर अदा और हर क़दम चर्चा का विषय बन जाया करता था। दूसरी ओर इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इन्हीं कलात्मक हरकतों के कारण हुसेन और आधुनिक कला दोनों को आम लोगों में पहचान और लोकप्रियता मिली। शायद ये कलाकार के अंदर की जन्मजात बेचैनी थी जो कभी रंगों से तो कभी अंगों से व्यक्त होती रहती थी। हुसेन स्वयं एक रहस्य कला थे।

नए नए शिगूफ़ों के कारण ख़बरों में स्थान पाना अलग बात है लेकिन कला जगत में अपना स्थान बनाने के लिए जिस स्तरीय कला की आवश्यकता होती है, वो हुसेन के पास भरपूर थी, गम्भीर और असाधारण कला। हुसेन ने अपने विशिष्ट कॉम्पोज़िशन, शोख़ रंग, बोल्ड स्ट्रोक्स और मानव व पशु आकृतियों के सरलीकरण से अपनी एक अलग पहचान बनायी। उनके चित्रों में शैली की निजता के बावजूद विषय और रूपाकारों में भारतीय कला का अक्स साफ़ देखा जा सकता है। बचपन में देखे हुए रामलीला के किरदार हों, मुहर्रम में निकलने वाले जुलूस में ताज़िये और दुलदुल (हज़रत इमाम हुसेन के घोड़े का प्रतीक) हो या भारत पर ब्रिटिश राज का अनुभव, हुसेन की कृतियों के स्थायी विषय रहे।

हुसेन में छोटी से छोटी वस्तु या घटना में अपना विषय खोज लेने और उसे एक महान कला में बदल देने की असाधारण प्रतिभा थी। वे इतने सम्वेदनशील थे कि सामाजिक सरोकार रखने वाली कोई भी महत्वपूर्ण घटना अक्सर उनके कैनवास पर अपनी जगह बना लेती। कई बार तो किसी घटना से अधिक उस घटना पर बनायी गई कृति को वे चर्चा का विषय बना दिया करते थे। हुसेन ने हर माध्यम और हर आकार में हज़ारों की संख्या में पेंटिंग्स बनाए। वे अपने आप में ऊर्जा का भंडार थे। अगर उनके समस्त कार्यों पर दृष्टि डालें तो विश्वास नहीं होता कि इतना काम और इतने प्रकार का काम किसी अकेले व्यक्ति द्वारा एक जीवन काल में सम्भव है।

किसी के कलाकर्म को लेकर ईमानदार आलोचना तो स्वस्थ कला की आवश्यकता है लेकिन अगर आलोचना में विरोध का स्वर शामिल होने लगे तो बात इरादों की आ जाती है। दुर्भाग्यवश हुसेन अपनी कुछेक कलाकृतियों के कारण जीवन के अंतिम पहर में साम्प्रदायिक राजनीति का शिकार हो गए। देश-विदेश में बड़ी संख्या में प्रशंसकों के बावजूद हुसेन के जीवन का एक दुखद पहलू ये है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समाज के कट्टरपंथी उनसे नाख़ुश रहे। मुस्लिम पृष्ठभूमि होने के बावजूद रामायण और महाभारत पर चित्र शृंखला और गणपति, हनुमान व देवी-देवताओं के चित्रण से शायद ये संदेश देना मक़सद था कि वे एक धर्म निरपेक्ष चित्रकार हैं और भारतीय संस्कृति का वे न केवल आदर करते हैं, बल्कि ये ही उनके अधिक प्रिय विषय भी हैं लेकिन कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने इन चित्रों में भी हिंदू विरोधी सोच ढूँढ निकाली, उधर आकृतिमूलक चित्र बनाने और विशेषकर देवी-देवताओं के चित्र बनाने के कारण मुस्लिम कट्टरपंथी उनके ख़िलाफ़ थे क्योंकि उनके अनुसार इस्लाम आकृतिमूलक चित्र बनाने की अनुमति नहीं देता। लिहाज़ा एक जमात ने उन्हें अच्छा मुसलमान नहीं समझा, तो एक समूह ने उन्हें केवल मुसलमान ही समझा लेकिन दोनों ओर के तंग नज़र लोगों ने अगर नहीं समझा तो उन्हें चित्रकार नहीं समझा।

जो चित्र हिंदुस्तान की ज़मीन में हुसेन की गहरी जड़ें होने के गवाह थे, वही चित्र इस महान देश की ज़मीन से उनकी जड़ें उखाड़ने का सबब बन गए। कुछ संगठनों ने जब ये चाहा कि धर्म के नाम पर हुसेन की रचनात्मक स्वतंत्रता के पर कतर दें तब क़तर के शाही परिवार ने उन्हें अपने देश की नागरिकता देकर ये संदेश दिया कि हुसेन जैसे कद्दावर कलाकार की नागरिकता किसी एक राष्ट्र तक महदूद नहीं है, बल्कि दूसरे राष्ट्र भी उन्हें अपना नागरिक बनाने के लिए बाँहें फैलाए खड़े हैं। हुसेन केवल अपनी कला के कारण ही अंतर्राष्ट्रीय कलाकार नहीं थे, बल्कि उनके मुक़द्दर में भी अंतर्राष्ट्रीयता थी। भारत में जन्मे, देश छोड़कर बस गए दुबई में, नागरिकता क़तर की पायी और हमेशा के लिए सो गए लंदन की ज़मीन में। निसंदेह हुसेन का व्यक्तित्व भी उनके कैनवास की तरह विस्तृत था। हुसेन आधुनिक कला के अनिवार्य पर्याय हैं। वे अकेले ऐसे चित्रकार थे जो कला को सम्पूर्णता में जीते थे। जैसे कला को उनके यहाँ एक शरणस्थली मिली।

प्रतिभा, ख्याति, सम्पन्नता, व्यस्तता, सहजता, विनम्रता, दरियादिली, य सारी विरोधाभास विशेषताएँ अगर किसी एक व्यक्ति में थीं तो वो थे मक़बूल फ़िदा हुसेन। जीवन के इन तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद हुसेन आज भी कला प्रेमियों में उतने ही मक़बूल हैं और कला की गहरी नज़र रखने वाले उनके कामों पर अब भी सौ जान से फ़िदा हैं।

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