‘मित्रो मरजानी’ हिन्दी का एक ऐसा उपन्यास है जो अपने अनूठे कथा-शिल्प के कारण चर्चा में आया। इस उपन्यास को जीवन्त बनाने में ‘मित्रो’ के मुँहज़ोर और सहज़ोर चरित्र ने विशिष्ट भूमिका निभायी है। ‘मित्रो मरजानी’ की केन्द्रीय पात्र ‘मित्रो’ अभूतपूर्व है… इसलिए भी कि वह बहुत सहज है। मित्रो की वास्तविकता को कृष्णा सोबती ने इतनी सम्मोहक शैली में चित्रित किया है जिसकी मिशाल हिन्दी उपन्यासों में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती और वास्तविकता पूरे उपन्यास में एक ऐसा तिलस्म रचती है जिससे यह अहसास जगता है कि मित्रो कोई असामान्य, मनोविश्लेषणात्मक पात्र नहीं है। हाँ, यह सच है कि हिन्दी उपन्यासों में इससे पहले ‘मित्रो’ जैसा चरित्र नहीं रचा गया। जबकि हिन्दी समाज में मित्रो जैसा चरित्र अतीत में भी था और आज भी है। किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। प्रस्तुत है किताब का एक अंश—

मित्रो झिझकी-हिचकिचायी नहीं। पड़े-पड़े कहा—सात नदियों की तारू, तवे-सी काली मेरी माँ, और मैं गोरी चिट्टी उसकी कोख पड़ी। कहती है, इलाके के बड़भागी तहसीलदार की मुँहादरा है मित्रो। अब तुम्हीं बताओ, जिठानी, तुम-जैसा सत-बल कहाँ से पाऊँ-लाऊँ? देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं पहचानता।… बहुत हुआ हफ्ते-पखवारे… और मेरी इस देह में इतनी प्यास है, इतनी प्यास कि मछली-सी तड़पती हूँ!

सुहाग फटी-फटी आँखों देवरानी को ऐसे तकती रही कि पहली बार देखा हो, कि नाक-नक्शा ध्यान में न आता हो, सिर हिला फीके गले कहा—देवरानी, इन भले लोकों को भुलावा दे तुम्हारी माँ ने अच्छा नहीं किया। तब एकाएक मुँह तमतमा आया—देवरानी, बहू-बेटियों के लिए तो घर-गृहस्थी की रीति ही लच्छमन की लीक। जाने-अनजाने फलाँगी नहीं कि…

मित्रो ने कानों पर हाथ दे आँखें नचाईं—ठोंक-पीट मुझे अपने सबक दोगी तो मैं भी मुँडी हिला लूँगी, जिठानी, पर जो हौंस इस तन व्यापी है…

सुहाग से सुना नहीं गया तो हाथ से टोक दिया—बस, देवरानी!

मित्रो ने सिरहाने पर सिर रखा और आँखें मींच अपने को समझाया—मित्रो रानी! चिन्ता-फिकर तेरे बैरियों को! जिस घड़नेवाले ने तुझे घड़ दुनिया का सुख लूटने को भेजा है, वही जहान का वाली तेरी फिकर भी करेगा!

बन्द आँखों में बनारसी का यार नयामत थानेदार दीख पड़ा। ऊँचा-लम्बा, मुच्छल। पहले पास खड़ा-खड़ा हँसता रहा फिर कड़ककर कहा—अरी ओ सुभान कौर! उठकर बैठ! देखती नहीं, कौन आया है!

— मेरी तरफ से काला चोर आया है। जरा जर के नयामत राय, यह तेरा थाना नहीं, मेरी चौकी है!

नयामत ने बाँह बढ़ा ओढ़नी खींच ली।

— बस… बस… बहुत हुआ! पड़ी रहेगी और चौकी लुट जाएगी!

मित्रो ने खुश हो बाँहें फैला दीं—वाह रे कमज़ात बिल्ले, मलाई देख मुँह मारने आया है!

रजाई परे जा गिरी तो सुहाग ने घुड़की दी—ख्याली घोड़े न दौड़ा, देवरानी, सीधी तरह सो जा। अबकी हिलते देखूँगी तो…

मित्रो कुलबुलायी। जी तो हुआ, जिठानी से कहे, जिस भड़वे की सूरत-मूरत मेरे तन-मन में बसी है उस पर तेरा क्या जोर? पर सोचा, जिठानी मेरी ज़रूर धर्म-सतवाली है। नहीं तो क्योंकर जान लेती कि मैं पड़ी-पड़ी नियामत से जवाब-सवाल करती हूँ!

मित्रो ने भिनसरे आँख खोली तो जिठानी के बदले सास को पास बैठे देख रात की सारी कथा-वार्ता याद हो आयी। चमककर बाँहें फैलायीं, अलसाई-सी अँगड़ाई ली और सास को ऐसे घूरा जैसे आँख-ही-आँख में हँस-हँस कहती हो, सासु जी, जवानी कहीं से माँगकर तो नहीं लायी।

आँखें मटका ढिठाई से कहा—मुँह अँधेरे यहाँ कैसे, माँ जी? मित्रो बिचारी अगले जहान तो नहीं चली कि उसका दीवा-बत्ती करवाने आयी हो?

धनवन्ती कई छिन बहू की ओर तकती रही, फिर सिर हिला बोली—बेटी, मुझ कर्म-जली के ऐसे भाग कहाँ? इज़्ज़त-मान से तेरा साईं तुझे भू पर उतारता तो मैं भी अपनी समित्रारानी को दिल खोलकर रोती, पर फूटी किस्मत मेरी, वह दिहाड़ा मुझे देखना न बँधा था।

— दिन-दहाड़े अभी बहुतेरे आएँगे, माँ जी, सारी चिन्ता-सोग आज ही न निपटा लो।

चौके से सुहाग की हाँक सुन धनवन्ती उठ बैठी और जाते-जाते माथे पर हाथ मार बोली—लख लानत है, बीबी मुझे, जिसने तुम्हारी माँ से माथा लगाया!

मित्रो कुछ कहने जाती थी कि द्वार पर जेठ की ऊँची परछाईं देख ठिठक गई। कल रात की बात याद कर मसखरी से छोटा-सा घूँघट निकाल बोली—जेठ जी, अपनी जिठानी के तूल तो मैं कहाँ पर एक नजर इधर भी…

सुना-अनसुना कर बनवारी लाल परत गए कि सुहाग ने आ देवरानी से कहा—तावली-तावली नहा-धो आयी, मँझली। छोटी का जी अच्छा नहीं। मैं घर-अँगना बुहार लेती हूँ, तुम चौके की सम्भाल लो।

— मैं मर गई, जिठानी! यह पापड़गिरों की फूलाँ आए दिन स्वाँग रचती है। खाने को दिन में चार दोने मिठाई और रात आधा सेर पक्के दूध में जलेबियाँ!

सुहाग ने सिर हिलाया—न… न… देवरानी, उसे झूठा दोष न दे, उसका तन ठीक नहीं!

मँझली ने आँखें नचायीं—आज हड्डी टूटती है, आज माथा फटता है, आज कमर दुखती है, आज दिल छिपता है…

सुहाग ने टोका—फूलावन्ती को आज सच ही दन्दल पड़ी है, देवरानी। देह उसकी काठ-सी अकड़ी पड़ी है।

— लाडो को क्या दिन चढ़े हैं! फूलावन्ती का तन ठीक रहे तो, बहन मेरी, वह पापड़गिरों की लड़की कैसी? मुटियार तो पक्की, ऐसे-ऐसे पापड़ बेल ले कि मर्द को पता न पाने दे कब कपड़ों से होती है।

सुहाग का जी तो हुआ खुलकर हँस ले, पर गम्भीर बनी रही। पुचकारकर कहा—उठ, मेरी बहना, जल्दी नहा-धो आ।

मित्रो ऐसे उत्साह से उठी कि सोलहवाँ लगा हो। आँगन में घरवाले को देखा तो और भी इतरायी।

— मैं अभी मरी नहीं हूँ, चन्न जी, जिन्दा हूँ।

जवाब में सरदारी ने कसे-कसाए तेवर दिखा दिए तो लापरवाही से बाँह हिला, मुँह चिढ़ा कहा—मेरी भी बोलेगी बला!

और नहान-घर में जा घुसी।

नहा-धो आयी तो जिठानी चौके में बैठी पराठे सेंकती थी। सासरानी लड़कों के संग बापू के कमरे में बैठी कोई खिचड़ी पकाती थी।

उमंग में चलती-डोलती मित्रो फूलावन्ती के कमरे में आयी तो देवरानी की बेहोशी टूट चुकी थी। पास बैठा देवर गुलजारी लाल फूलाँ के हाथों की तालियाँ झसता था।

मँझली दिल में हँसी। ऊपर से देवरानी को चुमकारकर कहा—हाय-आय! फूलावन्ती, इस कच्ची उम्र तू कैसे-कैसे रोग लगा बैठी! यह बेहोशी नास-होनी तो देह का सारा रक्त चूस लेती है!

'मित्रो मरजानी' से कुछ उद्धरण

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