सबसे पहले मेरे कहने के साहस को आलोचक दृष्टि से न देखकर बल्कि पाठकीय दृष्टिकोण से देखने का अनुरोध है। हमारा सारा इतिहास स्मृतियों का कच्चा चिट्ठा है अर्थात स्मृति के सहारे कहानी रचना, मानवीय संवेदनाओं का मौखिक इतिहास है। जब हम संवेदनाओं का आकलन गणितीय विधि से नहीं कर सकते, तब मनुष्य गीत और कविता में स्मृति के सहारे जीवन की कहानी रचता है। कविता ठोस चीज़ों की तरह स्पष्ट दिखायी नहीं देती बल्कि वह पानी की भाषा में बात करती है-

“उसकी उनींदी आँखों के आईने में
अपना अक्स देखकर
बुरी तरह डर गया मैं…”

दरअसल आज हमारी स्मृतियाँ इतनी भयावह हो गयी है कि हमें चिप/क्लाउड स्टोरेज के युग में ख़ुद को याद करने का समय नहीं है।

विनोद पदरज की कविताओं का मुख्य स्वर स्मृति है। उनका ‘देस’ कविता संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित है। मैं कविताओं से गुज़रते हुए महसूस कर रहा हूँ कि विनोद पदरज की कविताएँ स्मृति बोध के सहारे कहानी रचती हैं। वैसे एक अर्थ में सारी कविताएँ कहानी होती हैं और उच्च कोटि का गद्य कविता की भाषा में बात करता है। उनकी कविताओं में प्रयुक्त बिम्ब और भाषा भागती दुनिया को पीछे मुड़कर देखने की उम्मीद है और सवाल भी है। शोख चित्र कविता में-

“एक आदमी लेटा है खाट पर
एक औरत बैठी है नीचे
पंखा हिलाती हुई…”

उनकी कविता में स्मृतियों के सहारे स्त्री के अनेक रूप हैं- पत्नी, प्रेमिका, बहन और बुढ़िया। लेकिन वे कोई महानगरीय स्त्री नहीं है बल्कि मासूमियत से भरी जिनकी सुबह-शाम और रात में हवा, पानी, रौशनी, माटी का ज़िक्र है। ‘स्त्री को जानना’ कविता में “स्त्री को जानने के लिए, स्त्री के पास स्त्री की तरह जाना होता है”, स्त्री के मन को समझना इतना सरल नहीं है। ‘ओढ़नी के फूल’ कविता के माध्यम से पहचान बताते हैं- “जिस दिन तुम इन फूलों को जान जाओगे/ शायद स्त्री को थोड़ा-सा पहचान जाओगे।” अतः स्त्री फूल तो है लेकिन फूल की आंतरिक संरचना समझना ही स्त्री को समझना है। “तुम जितने भी फूलों को जानते हो/ उनमें से कोई भी फूल/ नहीं है उनकी ओढ़नियों पर”। उनकी कविता में बेटा-पिता और माँ-बेटी इन चारों के बीच संवाद के माध्यम से अनुभूत जीवन सच्चाई को व्यक्त किया गया है। ‘अब’ कविता में-

“पिता चले गए
अब घर में सबसे बड़ा हूँ मैं!”

अस्सी वर्षीय वृद्धा का बेटा पचास साल पहले ढाई साल की उम्र में गुज़र गया। उसकी याद में उस तरह रोते हुए कहती है जो संभावना भरी स्मृति है-

“क्या पता वह होता तो
देखभाल करती उसकी।”

शहर गए तीन बेटों की कमियों को माँ कुछ इस तरह आँचल में छुपा लेती है। क्योंकि वह तीनों के पास कुछ दिन गुज़ारकर आयी है और एक पंक्ति में तीनों बेटों की समस्या का, यूँ कहिए कि आज बेटों के लिए माता-पिता को बोझ से बन गए। माँ हृदय वहीं है-

“अब माँ कहती है
उसका मन गाँव में ही लगता है…”

‘देस’ कविता सामाजिक विर्मश और विसंगतियों पर ज़ोरदार प्रहार है। कविता के अंत में जीवन भर सामाजिक शोषण का शिकार एक बीमार व्यक्ति गाँव के पेड़ दिखाने की बात कहता है। अतः गाँव की हवा से और लोगों से सब कुछ सहने के बाद भी प्रेम है और वह मृत्यु भी उसी माटी में चाहता है। एक तरह शोषण को इतना आसान बना दिया है जो सहता है वहीं स्वारोक्ति देता है। यहाँ सारा सामाजिक विमर्श छिन्न-भिन्न हो जाता है-

“कितना अपमान भोगा था गाँव में
मंदिर की तो बात ही क्या
तालाब पर नहा नहीं सकते थे
कुँए पर जा नहीं सकते थे
पंगत में जीम नहीं सकते थे
कोने में बैठते थे छाबड़ी लेकर।”

उसी गाँव के लिए अस्पताल में भर्ती पिता बेटे से कहता है-

“मोकू घरां ले चाल
गाँव का रुखड़ा दखा…”

जहाँ विनोद पदरज की कविता का परिवेश और भाषा दोनों उनकी कविता की शक्ति है वहीं पाठक को थोड़ा पसीना बहाना पड़ेगा, तब कविता का आस्वादन होगा। उनकी संवेदनात्मक भूमि सवाई माधोपुर-करौली और दौसा के आस-पास का क्षेत्र है। कविता आंचलिक शब्द-बिम्ब और पूरा का पूरा वाक्य क्षेत्रीय है। मेरी दृष्टि में कभी-कभी कविता की पहुँच कम हो जाती है। यहाँ पाठक को परिश्रम करना पड़ेगा।

उनकी कविता में क्षेत्र के साथ देश का ज़िक्र है तो समकालीन राजनीतिक परिदृश्य पर उनकी ‘गुलाम मोहम्मद’ और ‘नंदिनी गाय’ कविता में अपने देस में डरते हुए नागरिक का दर्द है-

“गुलाम मोहम्मद मेरा दोस्त है
आप कहेंगे यह भी कोई कहने की बात है!”

“आधार कार्ड रख लूँ जेब में
गौशाला के चंदे की रसीदें
चारों धाम ढोकते ख़ुद की तस्वीरें
तब निकलूँ- सड़क के रास्ते!


जबकि जाना आना मात्र एक कोस है
और अपना ही देस है।”

अंत में ‘बेटियाँ’ कविता जो लड़कियों की स्थिति और पुत्र मोह / भ्रूण हत्या की कम शब्दों में दर्द की गाथा है-

“पहली दो के नाम तो ठीक ठाक हैं
उगंती फोरंती
तीसरी का नाम मनभर है
चौथी का आचुकी
पांचवी का जाचुकी
छठी का नाराजी

तब जाकर बेटा हुआ
मनराज

गर शहर होता तो
आचुकी जाचुकी नाराजी मनभर
पैदा ही नहीं होतीं
मार दी जातीं गर्भ में ही
यह बात आचुकी जाचुकी नाराजी मनभर नहीं जानती
वे तो भाई को गोद में लिये
गौरैयों सी फुदक रही हैं
आँगन में…”

~ अमर दलपुरा

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