मंटो और ग़ालिब की दोज़ख

जिस किताब की बात आज मैं करने जा रहा हूँ उसे रबिशंकर बल ने मूल रूप से बंगला में लिखा है और इसका अनुवाद...

निषिद्ध – एक प्रहार लैंगिक विषमता के विरुद्ध

निषिद्ध — एक आवाज़ …लैंगिक विषमता के विरुद्ध जैसा कि सर्वविदित है तसलीमा नसरीन ने हमेशा ही समाज में औरतों को समानता का अधिकार दिलाने,...

सियाह औ सुफ़ैद से कहीं अधिक है यह ‘सियाहत’

किताब समीक्षा: डॉ. श्रीश पाठक - आलोक रंजन की किताब 'सियाहत' आज की दुनिया, आज का समाज उतने में ही उठक-बैठक कर रहा जितनी मोहलत उसे...

‘गगन दमामा बाज्यो’ और इंकलाब शुरू!

किताब: 'गगन दमामा बाज्यो' लेखक: पीयूष मिश्रा प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन समूह मूल्य: ₹125 मात्र *** भगत सिंह - कैसी छवि बनती है यह नाम सुनकर ? टोपी पहने हुए...

यशपाल का ‘झूठा सच’

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक क्रांतिकारी होने से लेकर हिन्दी लेखक बनने तक का सफर तय करने वाले यशपाल का उपन्यास 'झूठा सच' भारत...

गवाचीयाँ गल्लां – अनवर अली

"हिंदू मुसलामानों की तमाम बातें सुनाते हुए अनवर ख़ुद कहीं भी मज़हबी या कट्टर नहीं नज़र आते। अपनी जवानी की हिमाक़तें, बचपन की बेवकूफ़ियाँ आप क़ुबूल करते चलते हैं। इसलिए किताब किसी मक़ाम पर भी किसी एक ज़ात के ख़िलाफ़ या किसी एक के हक़ में खड़ी होती ही नहीं है, बल्कि इस तरह की हर अपरिपक्वता की खिल्ली उड़ाती अपनी राह चलती जाती है।"

मॉरी से मुलाक़ात

अमेरिकी लेखक और स्तम्भकार मिच एलबॉम की किताब 'ट्यूज़डेज़ विद मॉरी' (Tuesdays with Morrie) एक मशहूर और प्रशंसित किताब है। इस किताब में मिच...

उम्मीदों का अफ़साना – ‘बाहिर’

उम्मीदों का अफ़साना - 'बाहिर' (समीक्षा: प्रदुम्न आर. चौरे) "आते हैं राहों में मसाइब कई, यूँ ही नहीं होता करिश्मा कोई।" यह शेर मैंने पॉल ए कॉफ़मेन द्वारा...

‘पांच एब्सर्ड उपन्यास’ – नरेन्द्र कोहली

'पांच एब्सर्ड उपन्यास' - नरेन्द्र कोहली नरेन्द्र कोहली की किताब 'पाँच एब्सर्ड उपन्यास' पर आदित्य भूषण मिश्रा की टिप्पणी! मैंने जब किताब के ऊपर यह नाम...

नरेन्द्र कोहली की ‘क्षमा करना जीजी’

'क्षमा करना जीजी' - नरेन्द्र कोहली आज सुबह "क्षमा करना जीजी" पढ़ना शुरू किया. यह नरेन्द्र कोहली लिखित सामाजिक उपन्यास है. यह अपने आप में...

‘पाकिस्तान का मतलब क्या’ – एक टिप्पणी

'पाकिस्तान का मतलब क्या' - एक टिप्पणी असग़र वजाहत की किताब 'पाकिस्तान का मतलब क्या' पर आदित्य भूषण मिश्रा की एक टिप्पणी मैं अभी पिछले दिनों,...

रंग तमाम भर चुकी सुब्ह ब-ख़ैर ज़िन्दगी..

जाने माने युवा शायर और युवा साहित्य अकादेमी विजेता अमीर इमाम की किताब 'सुब्ह ब-ख़ैर ज़िन्दगी' कुछ ही दिनों पहले रेख़्ता बुक्स से प्रकाशित...

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Kirti Chaudhary

सुख

रहता तो सब कुछ वही है ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले... बदलता तो कुछ भी नहीं है। लेकिन क्या होता है कभी-कभी फूलों में रंग उभर आते हैं मेज़पोश-कुशनों...
Women at beach

मन का घर, तुमसे विलग होकर

मन का घर उसके मन के घर में गूँजती रहती हैं टूटती इच्छाओं की मौन आवाज़ें उसमें हर बालिश्त दर्ज होती जाती है छूटते जा रहे सपनों से पलायन की एक लम्बी...
Bashar Nawaz

वक़्त के कटहरे में

सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी है अपने जुर्म पे रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बेजान रिदाएँ मत डालो सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं तुम ख़्वाबों की ताबीर से...
Giriraj Kishore

नायक

'रिश्ता और अन्य कहानियाँ' से आँगन में वह बाँस की कुर्सी पर पाँव उठाए बैठा था। अगर कुर्ता-पाजामा न पहने होता तो सामने से आदिम...
Love, Couple

नीरव की कविताएँ

1 ढहते थे पेड़ रोती थी पृथ्वी हँसता था आदमी मरती थी नदी बिलखता था आकाश हँसता था आदमी टूटता था संगीत बुझता था प्रकाश हँसता था आदमी टूट रहा है आदमी बुझ रहा है...
Dilawar Figar

दावतों में शाइरी

दावतों में शाइरी अब हो गई है रस्म-ए-आम यूँ भी शाइर से लिया जाता है अक्सर इंतिक़ाम पहले खाना उसको खिलवाते हैं भूखे की तरह फिर उसे करते...
Bharat Bhushan

मन, कितना अभिनय शेष रहा?

मन, कितना अभिनय शेष रहा? सारा जीवन जी लिया, ठीक जैसा तेरा आदेश रहा! बेटा, पति, पिता, पितामह सब इस मिट्टी के उपनाम रहे, जितने सूरज उगते देखो उससे ज़्यादा संग्राम...
Mohammad Alvi

मैं और तू

ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि मैं तुझसे नज़रें मिलाऊँ तिरी शान में कुछ कहूँ तुझे अपनी नज़रों से नीचे गिराऊँ ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि...
Vishnu Khare

अकेला आदमी

अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ अगर वे लोग...
Ambar Bahraichi

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते धूल का तूफ़ाँ अंधेरे बो रहा था देखते सब्ज़ टहनी पर मगन थी फ़ाख़्ता गाती हुई एक शकरा पास ही...
Malkhan Singh

मुझे ग़ुस्सा आता है

मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना आया है कि जोरू मैला...
Bulbbul - a comment

सीता और काली की बाइनरी से अछूती नहीं है ‘बुलबुल’

मनोरंजन के 'तीसरे' परदे के रूप में उभरे नेटफ़्लिक्स पर आयी फ़िल्म 'बुलबुल' इन दिनों ख़ूब चर्चा में है। चर्चा का मुख्य विषय है...
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इतिहास की कालहीन कसौटी

बन्‍द अगर होगा मन आग बन जाएगा, रोका हुआ हर शब्‍द चिराग़ बन जाएगा। सत्ता के मन में जब-जब पाप भर जाएगा झूठ और सच का सब अन्‍तर मिट जाएगा न्‍याय...
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बेटिकट

एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है और बेतहाशा चलती चली जाती है समय की किसी अज्ञात दिशा में मैं सवार...
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मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...
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समकालीन युवा लेखन पर कुछ विचार

जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...
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हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे पर इसमें हुआ नुक़सान बड़ा कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा हम राख लिए हैं झोली...
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दुनिया की नहीं तो यूरोप की छत : अपने पर्वतीय प्रदेश के कारण स्विटजरलैण्ड को प्रायः यह नाम दिया जाता था—किन्तु हिमालय को घर...
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अरबी बाज़ार

Short Story: 'Araby' Writer: James Joyce अनुवाद: उपमा ऋचा लेखक परिचय: आयरलैण्ड के रचनाकार जेम्स जॉयस (1882-1941) ने सिर्फ़ कहानियाँ ही नहीं लिखीं, उपन्यास भी लिखे और साहित्य...
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