मैं उन्हें चार सौ छत्तीस दिन गिनूँगा
या थोड़े संकुचित मात्रक में क़रीब चौदह महीने
गिनने को मैं गिन सकता था
एक साल, दो महीने, बारह दिन
पर मैं वह मात्रक चुनूँगा
जिसमें मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिक महसूस सकूँ
उस समय को
जब मैं और तुम एक साथ जीवित रहे पिता

मैं रहा होऊँगा एक मंद बुद्धि शिशु ही
क्योंकि मुझे कोई स्मृति नहीं
तुम्हारे जीवित स्वरूप की
ना ही कोई वीडियो या आवाज़ का सैम्पल
कल्पना के लिए मेरे पास हैं
कुल जमा तीन-चार फ़ोटो
जिनमें से एक में तुम्हारी सिर्फ़ मूँछें हैं
पर मुझे ज़्यादा पसंद है वह दाढ़ी-मूँछ वाली फ़ोटो

हर पुत्र अपने पिता जैसा बनना चाहता है पिता
और मैं चहक उठता हूँ दर्पण में हल्का-सा तुम्हें पाकर
क्योंकि मेरी भी मूँछें ठोड़ी पर उगी दाढ़ी तक नहीं पहुँचती
तुम्हारे नाम की तरह मेरे भी उपनाम में
छूट गया है एक बेवजह का अंतराल
मैंने भी जैसे-तैसे जोड़ लिया है नाम के आगे डॉक्टर

मैंने बड़ी सम्भालकर रखी है
प्रेस्क्रिप्शन वाली तुम्हारी डायरी
उस पर बनाए हुए चित्र
तुम्हारे द्वारा लिखा गया हम भाई-बहन का नाम

तुम बनाकर छोड़ गये हो
महाकवि ‘निराला’ का एक स्केच
क्या उसी में सौंप गए हो कविता की विरासत मुझे
स्केच बनाना तो दूर, एक सीधी रेखा तक ना खींच सकने वाला मैं
चित्रकारी का मुरीद मात्र बने रहकर संतुष्ट हूँ
हर नये देश की यात्रा में
सबसे पहले ढूँढता हूँ आर्ट म्यूज़ियम का पता
हर चित्र को समझने का प्रयास करता हूँ

‘निराला’ का तुम्हारा बनाया स्केच देखकर कहती हैं
एक अमेरिकन आर्ट क्रिटिक
कि तुम मुझे सौंप गए हो कला की मशाल,
एक साल, दो महीने, बारह दिन का कोई बच्चा
नहीं चाहता थामना अपने पिता की मशाल
तुम्हें और दौड़ना था, बहुत लम्बे रास्ते पर

तुम्हारे लिए लिखी कविता में,
मैं नहीं करूँगा शिकायत
मेरी अकादमिक सफलताओं पर तुम्हारे मुझे सीने से ना लगाने की
बल्कि मैं याद करूँगा तुम्हारे बारे में सुने हुए उन क़िस्सों को
जो मेरे लिए लोककथा की तरह हैं
तुम बहुत फुर्तीले थे, एकदम छरहरे
और मैं एकदम विपरीत
पर मैं प्रसन्न हूँ कि मैंने विनोदी स्वभाव तुम जैसा पाया
और वह सीख जो सिर्फ़ एक बार मेरे सपने में आने पर तुमने दी थी
तुम्हारी ही विरासत के सहारे मैं निकाल लेता हूँ कठिन दिन हँसकर

मुझे किंवदंतियों पर भरोसा था
तुम्हारी ही तलाश में
मैं ताकने लगा था रात का आकाश
और दक्षिण-पूर्व आकाश में एक तारा मान लिया था तुम्हें

अब मैं जानता हूँ
कि वह तारा तुम नहीं हो
कोई और तुमसा हो भी नहीं सकता
पर आज रात आसमान साफ़ है इस पहाड़ पर
आज फिर वह तारा मुझे दिखा
और आज फिर मुझे तुम याद आए पिता!

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देवेश पथ सारिया
बतौर रचनाकार मैं मुख्य रूप से हिन्दी कवि हूं। अनुवाद कार्य एवं कथेतर-गद्य लेखन में भी कुछ रुचि रखता हूँ। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, वागर्थ, कादंबिनी, कथादेश, कथाक्रम, पाखी, आजकल, परिकथा, समयांतर, अकार, बया, बनास जन, जनपथ, समावर्तन, नया पथ, आधारशिला, प्रगतिशील वसुधा, दोआबा, अक्षर पर्व, परिंदे, मंतव्य, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, ककसाड़, उम्मीद, कला समय, रेतपथ, पुष्पगंधा आदि। समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, पोषम पा, अनुनाद, बिजूका, समकालीन जनमत, शब्दांकन, कारवां, अथाई। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। ई-मेल: [email protected]gmail.com