कभी-कभी सोचती हूँ
मैं दुविधाओं की नगरी की चौकीदार हूँ
निगरानी करती हूँ ओट में छिपे प्रेम की
मेरे आँगन के दरीचे में द्वंद्व बिखरे हैं
एक रोशनदान धूप समेट लाता है
उजाले और रोशनी के भेद में खो जाती हूँ मैं
जीवन ने जितनी ख़लाएँ दी हैं
मैं गिन-गिनकर सांख्यिकी के सारे अंक उड़ेल देना चाहती हूँ
ताकि बचा न रह जाए लेश मात्र भी और खलना
किसी गहरे समुन्दर की खोह में समाए खारेपन की तरह
किसी सूर्य की उपस्थिति में फैले प्रकाश की तरह
अपने होने को सत्यापित करता हुआ ठहराव चाहती हूँ
इतना उजास भर लेना चाहती हूँ कि
अंधेरों से झपटकर लड़ पडूँ
रौनक़ों का एक इंद्रधनुष बनाकर
टाँगना चाहती हूँ चाहतों के आसमान पर
लाँघना चाहती हूँ पूर्वनिर्धारित तमाम दायरे
गति को छलना चाहती हूँ
अड़चनों को हमसफर मानकर
मन के डरों को डराते हुए
आँखों में ख़्वाबों को सम्भाले हुए
अस्त-व्यस्त से स्वरूप में
जी भरकर मुस्कुराते हुए
चली जाना चाहती हूँ
दूर क्षितिज की खोज में।

हक़ीक़त के इस धरातल पर
ख़्वाबों की दुनिया सजाने
क्या तुम साथ चलोगे?

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अदिति टांडी
'प्रेयसी'

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