एक शालीन ज़िद थी
जो रचना चाहती थी
अपने चारों तरफ़ की लिज-लिज दुनिया को
करईल माटी की तरह
ठोस, मुलायम और चमकदार

एक तड़प थी
जो शोषण के हर हरबे पर
बिजली की तरह टूटती थी
करने को उसे चाक

एक चिंगारी थी
जो तब्दील होना चाहती थी
एक मुक्कमल आग के सैलाब में
हर पाखंड को करना था उसे ख़ाक

एक चाहना थी खिले हर फूल
अपनी हर सम्भावना के साथ
न मिले धूल में अनखिले, अधखिले

एक करुणा थी
जो दूर से ही दिखती थी सरे हाट

एक शुबहा था
जो हर झूठ के आड़े आता था

इतना कुछ था एक रीढ़ की मज़बूत हड्डी
के अगल बग़ल
लोग प्यार से उसे
चंदू बुलाते थे!

( ज. ने . वि. छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष जिनकी सिवान में हत्या कर दी गई)

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