चीलगाड़ी

‘Cheelgaadi’, a poem by Vijay Rahi

आंटे-सांटे में हुई थी उसकी सगाई
दूज वर के साथ
हालाँकि ख़ूब जोड़े थे उसने माँ-बाप के हाथ।

जब ब्याह नज़दीक आया
और कोई रास्ता नज़र नहीं आया
तो फिर उसने घर के पीछे
बैठ पीपल की छाँव में
तुरत-फुरत संदेशा लिक्खा
भेजा बग़ल के गाँव में।

ठीक लगन के दिन की बात है…
आधी रात, गजर का डंका
बिजली कड़की
चुपके-चुपके पाँव धरती
घर से बाहर निकली लड़की।

प्रेमी उसका इंतज़ार कर रहा था
माताजी के थान पर
दोनों ने धोक लगायी।

काँकड़ के बूढ़े बरगद ने
आशीष बख़्शा।

प्रेमी के गाँव की दूरी
सवा कोस थी

वे पगडण्डियों पर
दौड़ते हुए जा रहे थे
डर की धूल को
हवा में उड़ाते हुए
मुस्कराते हुए।

उन्हें जुगनुओं ने रास्ता दिखाया
टिटहरियों कुछ खेत उनके साथ चली
दुआएँ देती हुई
झिंगुरों ने शहनाई बजायी।

बिल्लियों, सियारों, खरगोशों ने
उनका रास्ता काटा,
शगुन हुए।

जब गाँव नज़दीक आया
तब जाकर उनके पाँव ज़मीन पर आये।

लड़की थोड़ा सहमी
लड़के का हिया उमग्याया
उसने लड़की के कंधे पर हाथ रखे
और माथा चूमा।

पास ढाणी की कोई शादी में
औरतें गीत गा रही थीं-
“बना को दादो रेल चलाबे
बनो चलाबे चीलगाड़ी।
खोल खिड़की, बिठाण ले लड़की
अब चलबा दे थारी चीलगाड़ी…”

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