छज्जे पर टँगा प्रेम

‘Chhajje Par Tanga Prem’, a poem by Poonam Sonchhatra

टाँग रक्खे हैं
बहुत से सुख-दुःख हमने छज्जे पर

कुछ बातें केवल इसलिए होती हैं
कि उन्हें छज्जे पर टाँग कर छोड़ दिया जाए

बारिश में भीगे कुछ लम्हें
इस दौड़ लगाती रूखी सी ज़िंदगी में
हमेशा तो साथ नहीं रखे जा सकते न

न ही साथ रखी जा सकती हैं
वो लम्बी-लम्बी बातें
जो कभी किसी ख़ूबसूरत और बेहद छोटी रात में
किसी एक अनजान शख़्स के साथ की गई थीं

टाँग दिए जाते हैं छज्जे पर
वो झगड़े भी रोज़ के रोज़
जो उस शख़्स के साथ होते हैं
जिसके साथ रोज़ रहना होता है

रास्ते चलते किसी अनजान का
देखकर यूँ ही मुस्कुरा देना,
बस में कोने की सीट पर अकेली बैठी एक अनजान
लड़की की आँखों के कोने से टपका एक आँसू,
आने-जाने के रास्ते में
किनारे पर अनायास ही उग आया एक जंगली फूल

कितना कुछ सहजते हैं हम रोज़
और टाँग आते हैं मन के छज्जे पर
ये सोचकर कि
कभी किसी रोज़ छज्जे से उतारकर
जिये जाएँगे ये लम्हें दुबारा
ठीक वैसे ही जैसे
किसी पुराने एल्बम की तस्वीरें फिर से पलटी जाए

सुनो…
क्या हमने हमारा प्रेम भी
यूँ ही छज्जे पर टाँग रखा है…?

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