बिल्ली आँखें मींचे बैठी,
होंठ जरा से भींचे बैठी,
दुबली-सी वह पीछे बैठी,
साँस मजे़ से खींचे बैठी,
पर चूहा सब जान गया है,
दुश्मन को पहचान गया है,
चाल नई है, मान गया है,
कुत्ते से वह जाकर बोला-
फाटक पर सोया है भोला,
दरवाजा थोड़ा-सा खोला,
अब बिल्ली पर कुत्ता झपटे,
या कुत्ते से बिल्ली निपटे,
बिल्ली गुपचुप नीचे बैठी,
चूहे ने निज मूँछें ऐंठी।

Previous articleआवश्यकता
Next articleबिरजू भैया
प्रभाकर माचवे
डॉ प्रभाकर माचवे (1917 - 1991) हिन्दी के साहित्यकार थे। उनका जन्म ग्वालियर में हुआ एवं शिक्षा इंदौर में हुई। इनके कविता-संग्रह हैं : 'स्वप्न भंग, 'अनुक्षण, 'तेल की पकौडियां तथा 'विश्वकर्मा आदि। इन्होंने उपन्यास, निबंध, समालोचना, अनुवाद आदि मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी में 100 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं।