शाम, हर शाम हर चेहरे पर
दिन को डायरी की तरह लिखती है
जिसमें दर्ज होती हैं दिन भर की सारी
नाकामियाँ, परेशानियाँ, हैरानियाँ, नादानियाँ
और हाशिए पर
धकेली गयीं छोटी ख़ुशियों की अठन्नियाँ-चवन्नियाँ

रातें किसी मासूम लड़की के सपने की तरह उजलीं
अधूरी इच्छाओं के ऊन से
दूसरे दिन का स्वेटर बुनती हैं
कल के प्रति आश्वस्ति
महबूब रात की आँख का काजल है

सुबह होते न जाने कौन सी हवा काजल चुराती है
कि पूरा आसमान धुआँ-धुआँ
जिसमें अतृप्त आत्माओं सी उभरती शक्लें
हर शक्ल अपने आप में
एक पूरी और एक अधूरी कहानी

हर शक्ल अपनी शक्ल को ढूँढती है
पर इतना धुँधलका कि उसे अपनी शक्ल नहीं दिखती
कोई कुछ समझ पाए
कि हो आती है एक और शाम
जो फिर लिखती है अपनी सारी चुगलियाँ
हर चेहरे पर डायरी की तरह

रात अब फिर एक ख़ूबसूरत इंतज़ार है, हर चेहरे का।

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अनुराग तिवारी
अनुराग तिवारी ने ऐग्रिकल्चरल एंजिनीरिंग की पढ़ाई की, लगभग 11 साल विभिन्न संस्थाओं में काम किया और उसके बाद ख़ुद का व्यवसाय भोपाल में रहकर करते हैं। बीते 10 सालों में नृत्य, नाट्य, संगीत और विभिन्न कलाओं से दर्शक के तौर पर इनका गहरा रिश्ता बना और लेखन में इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति को पाया। अनुराग 'विहान' नाट्य समूह से जुड़े रहे हैं और उनके कई नाटकों के संगीत वृंद का हिस्सा रहे हैं। हाल ही में इनका पहला कविता संग्रह 'अभी जिया नहीं' बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।