लेखक ने अपनी बात कहने के लिए अपनी भाषा रची है, इसलिए इसका अनुवाद करने के लिए आपको भी अपनी भाषा गढ़नी होगी। —डेज़ी रॉकवेल

डेज़ी रॉकवेल के इंटरव्यू के अंश

अनुवाद एवं प्रस्तुति : उपमा ऋचा

रेत समाधि को वर्ष 2022 के बुकर सम्मान का मिलना हिंदी साहित्य के लिए एक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। बेशक यह उपलब्धि है भी, एक विशिष्ट उपलब्धि! लेकिन उपलब्धि का उत्सव मना रहे हिंदी साहित्य जगत के लोगों के लिए यह उस दीवार को आलोचनात्मक दृष्टि से टटोल लेने का क्षण भी है, जिस पर वह सदियों से पुश्त टिकाए खड़े हैं मगर कभी पलटकर देखा नहीं कि कब-कहाँ से कलई छूटी और कब-कहाँ सुराख़ हुआ। कम से कम इस उत्सव की पूर्वपीठिका रचने वाली डेज़ी रॉकवेल का अनुभव तो यही कहता है।

रॉकवेल हिंदी-उर्दू साहित्य से विशेष अनुराग रखती हैं। अनुवादक होने के साथ-साथ वे एक गम्भीर लेखिका हैं। चित्रकार हैं। गीतांजलि श्री से पहले डेज़ी उपेन्द्रनाथ अश्क, भीष्म साहनी, ख़दीज़ा मस्तूर और कृष्णा सोबती की कृतियों का अनुवाद कर चुकी हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क : ए क्रिटिकल बायोग्राफ़ी, टेस्ट (उपन्यास) और लिटिल बुक ऑफ़ टेरर (युद्ध-आतंक पर आधारित कलाकृतियों और आलेखों का संग्रह) उनकी मौलिक कृतियाँ हैं। रेत समाधि के लिए बुकर पुरस्कार की घोषणा होने से कुछ दिन पहले कोलम्बियाई जर्नाल ऑफ़ लिट्रेरी क्रिटिसिज़्म की सम्पादक केना चावा के साथ बातचीत करते हुए डेज़ी ने किसी लाग-लपेट के बग़ैर कहा—

मुझे पता है कि यह थोड़ा अजीब है, लेकिन बांग्ला अनुवादक मेरे मित्र हैं, वो कहते हैं कि आमतौर पर वह जिन पुस्तकों का अनुवाद करते हैं, उनका आकार अंग्रेज़ी में आने पर लगभग बीस प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यह शब्दों के आकार की वजह से हो सकता है या इसी तरह के किन्ही अज्ञात कारणों से… मैंने भी इसे सही पाया। हालाँकि मुझे इस किताब (यानि रेत समाधि के अंग्रेज़ी अनुवाद टूम ऑफ़ सेंड) के पंद्रह-बीस प्रतिशत तक विस्तार की उम्मीद थी, लेकिन यह दोगुना हो गया। इस बात को दूसरे ढंग से भी समझाया जा सकता है, जैसे हिंदी प्रकाशक काग़ज़ बचाने की कोशिश करते हैं, इसलिए वे सब कुछ एक साथ ठूँस देते हैं, या कई बार अलग-अलग अध्यायों के बीच किसी तरह का कोई पृष्ठ विराम नहीं देते। मुझे इस काम में पर्याप्त समय ख़र्च करना पड़ा। आख़िर यह एक घनी बुनावट वाली किताब है जिसे साँस लेने के लिए जगह चाहिए।

लेकिन मैं अब भी पूर्ण स्पष्टता महसूस नहीं करती। टिल्टेड एक्सिस प्रेस का भी छोटा पृष्ठ प्रारूप है। वे चाहते हैं कि उनकी सभी किताबें समान आकार और डिज़ाइन की हों। उनकी अधिकांश पुस्तकें उपन्यास या लघु कहानी संग्रह हैं। वास्तव में उन्होंने कभी बड़ी किताब पर काम नहीं किया और इसलिए यह एक फ़ोनबुक की तरह लग रही है, जो मुझे लगता है कि बहुत सारे पाठकों को डराने वाला रूप है, क्योंकि आप अपने सामने एक ईंट जैसा आकार देखते हैं और सोचने लगते हैं, “ओह, यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। एक तरह की क़ैद!”

इसके अनुवाद में मुझे काफ़ी समय लगा। मैंने जितना सोचा था उससे ज़्यादा समय लगा; क्योंकि यह मेरी सोच से ज़्यादा कठिन काम था। …मैंने उम्मीद की थी कि यह लगभग पाँच सौ पृष्ठ की किताब बनकर तैयार होगी, लेकिन जब उन्होंने मुझे टाइपसेटिंग के लिए पीडीएफ़ वापस भेज दिया, तो यह सात सौ से ज़्यादा पन्नों में फैल चुकी थी। एकबारगी मैं पूरी तरह हैरान रह गई, लेकिन फिर मैंने सोचा, “हैरानी की बात नहीं, यह बहुत कठिन था!”

इतना कठिन होने का एक और कारण यह था कि गद्य शैली बहुत ही प्रयोगात्मक और विशिष्ट स्वभाव से सम्पन्न है। इसमें कई काव्यात्मक खंड हैं। (जिनका अनुवाद करते हुए) अंतत: मुझे एहसास होने लगा कि यह गद्य की तुलना में कविता का अनुवाद करने जैसा है। मैं इसे जेम्स जॉयस की रची यूलिसिस के अनुवाद करने के जैसा पाती हूँ, या कुछ ऐसा, जहाँ एक व्यक्ति ने अपनी बात कहने के लिए अपनी भाषा रची है, इसलिए आपको भी इसका अनुवाद करने के लिए अपनी भाषा गढ़नी होगी। यह स्पष्ट रूप से करना बहुत कठिन काम था।

…इस किताब में बहुत श्लेष हैं। गीतांजलि श्री चाहती थीं कि मैं इसे अंग्रेज़ी में री-क्रिएट करूँ—माने इसे शब्दशः ग्रहण करने की बजाय इससे ‘खेलूँ’। यह एक और चुनौती थी, क्योंकि अभी तक मैं मृत या मृत-प्राय लोगों का अनुवाद करने की अभ्यस्त रही हूँ।

क़िस्मत से मेरे पास बहुत से ऐसे दोस्त हैं, जिनसे मैं किसी-भी मुद्दे पर बात कर सकती हूँ। मेरे आसपास चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने वाले भी बहुत हैं, पर यह भयावह है कि अक्सर मुझे ख़ुद पर निर्भर होना पड़ता है। मुझे सही करने वाला कोई नहीं…  यहाँ तक कि भारतीय सम्पादक भी पर्याप्त हिंदी नहीं जानते, ऐसे में मेरे पास कोई नहीं जो बताए कि मैं कहाँ ग़लत हूँ। और मैं सही रास्ते पर हूँ यह सुनिश्चित करने के लिए मुझे लगातार लोगों से सम्पर्क करना पड़ता है। मैं जानती हूँ, ऐसी कई जगहें हैं, जहाँ मेरे ग़लत होने की पूरी सम्भावना है, मगर अनुवाद में केवल सटीकता ही इकलौता पक्ष नहीं है। मुझे लगता है कि इस बात को याद रखना महत्त्वपूर्ण है। शब्द-दर-शब्द सटीकता इस समीकरण का केवल एक पक्ष है, भाव और सौंदर्य अनुभव की सटीकता के अपने मायने हैं। कभी-कभी सही भाव लाने के लिए आपको शब्द-अर्थ को थोड़ा बदलना पड़ता है। इसीलिए मैं इस बात को दिल में नहीं रख सकती कि मैं ग़लत हूँ या नहीं। एक हद तक मैं कोशिश करती हूँ, बाक़ी जाने देती हूँ।

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उपमा 'ऋचा'
पिछले एक दशक से लेखन क्षेत्र में सक्रिय। वागर्थ, द वायर, फेमिना, कादंबिनी, अहा ज़िंदगी, सखी, इंडिया वाटर पोर्टल, साहित्यिकी आदि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता, कहानी और आलेखों का प्रकाशन। पुस्तकें- इन्दिरा गांधी की जीवनी, ‘एक थी इंदिरा’ का लेखन. ‘भारत का इतिहास ‘ (मूल माइकल एडवर्ड/ हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया), ‘मत्वेया कोझेम्याकिन की ज़िंदगी’ (मूल मैक्सिम गोर्की/ द लाइफ़ ऑफ़ मत्वेया कोझेम्याकिन) ‘स्वीकार’ (मूल मैक्सिम गोर्की/ 'कन्फेशन') का अनुवाद. अन्ना बर्न्स की मैन बुकर प्राइज़ से सम्मानित कृति ‘मिल्कमैन’ के हिन्दी अनुवाद ‘ग्वाला’ में सह-अनुवादक. मैक्सिम गोर्की की संस्मरणात्मक रचना 'लिट्रेरी पोर्ट्रेट', जॉन विल्सन की कृति ‘इंडिया कॉकर्ड’, राबर्ट सर्विस की जीवनी ‘लेनिन’ और एफ़. एस. ग्राउज़ की एतिहासिक महत्व की किताब ‘मथुरा : ए डिस्ट्रिक्ट मेमायर’ का अनुवाद प्रकाशनाधीन. ‘अतएव’ नामक ब्लॉग एवं ‘अथ’ नामक यूट्यूब चैनल का संचालन...सम्प्रति- स्वतंत्र पत्रकार एवम् अनुवादक

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