किताब ‘साहित्यिकों से’ से – विनोबा भावे से प्रश्नोत्तर का एक अंश

प्रश्न— राष्ट्रभाषा पर कुछ कहें।

उत्तर— अब हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा बना चुके हैं। परिणामतः दूसरे प्रान्तवाले भी हिन्दी सीख रहे हैं। हिन्दी जाननेवाले अब केवल उत्तर भारतवाले ही नहीं रहेंगे। दक्षिणवालों को हिन्दी सीखने में कितना अधिक परिश्रम उठाना पड़ता है, इसकी कल्पना हम उत्तरवाले नहीं कर सकते। हिन्दी में जो लिंग-भेद है, वह दक्षिण में क़तई नहीं है। वहाँ अचेतन-चेतन का भी भेद नहीं। इसलिए जब हिन्दीवाले दीवार को स्त्रीलिंग और पत्थर को पुल्लिंग कहते हैं, तो वे लोग घबरा जाते हैं। फिर, अगर ऐसा हो कि छोटी वस्तु को स्त्रीलिंग मानें जैसे कटोरी और बड़ी को पुल्लिंग जैसे कटोरा, तो दीवार तो बहुत बड़ी है, और पत्थर छोटा है। उनकी दिक्कत इसलिए भी बढ़ जाती है कि अंग्रेज़ी में भी ऐसा लिंग-भेद नहीं है।

इसलिए हमारे हिन्दी के साहित्यिक भी दक्षिण भारत की एक भाषा सीखें, तो बहुत अच्छा होगा। मैं ख़ास तौर से तमिल सीखने की सिफ़ारिश करूँगा। यह भाषा दो हज़ार वर्ष पुरानी है। उसका अपना सुन्दर व्याकरण है। हमारी भाषाओं के व्याकरण—हिन्दी, मराठी आदि के व्याकरण तो सौ-सौ वर्ष ही पुराने हैं, लेकिन तमिल का व्याकरण कम-से-कम उन्नीस सौ वर्ष पुराना है। तमिलवाले हिन्दी ज़ोरों से सीख रहे हैं। नतीजा यह है कि हिन्दी के अच्छे-अच्छे ग्रन्थों का तमिल में अनुवाद हो रहा है। लेकिन तमिल के ग्रन्थों का हमें पता नहीं लगता।

और अगर ऐसा ही रहा कि हम तो उनकी भाषा सीखें नहीं और वे हमारी भाषा सीखते ही रहें, तो अंग्रेज़ी के बारे में जो विरोध की भावना लोगों के हृदय में पैदा हो गयी थी, वैसी ही भावना हिन्दी के बारे में भी हो सकती है। आज हिन्दी भाषा के ज्ञान के बारे में आपके मामूली-से-मामूली आदमी की बराबरी करने के लिए उनके बड़े-से-बड़े आदमी को दस-दस, पाँच-पाँच साल मेहनत करनी पड़ती है। यह कोई अच्छी बात नहीं है। इसलिए हमें अपनी भाषा में, उसके व्याकरण में अखिल भारत की दृष्टि से सुधार करने चाहिए। इसलिए मेरा कहना है कि जब लोग उनकी एक भाषा सीख लेंगे, तो हमें उनकी दिक्कतों का पता चलेगा और हमारा मन हिन्दी में सुधार के लिए अनुकूल होगा।

भाषा सीखने की यह बात मैं किसी के लिए लाज़िमी नहीं करना चाहूँगा, क्योंकि यह सब प्रेम से होना चाहिए। काशी और प्रयाग में दक्षिण के कितने ही लोग निवास करते हैं। उनसे हमारे सम्बन्ध बंधे और बढ़ें, तो उन्हें अच्छा तो लगेगा ही, हमें भी लाभ होगा। बेलूर जेल में क़दम रखते ही मैंने तमिल पढ़ना शुरू किया। लोगों को अचरज हुआ। वहाँ दक्षिण के चारों प्रान्तों के लोग जमा थे, लेकिन वे भी आपस में अंग्रेज़ी में ही बोलते थे। मैंने तमिल सीखना शुरू किया। हमारे तमिल के गुरुजी ने कहा कि ‘आपने इस जेल में आकर तमिल की इज़्ज़त बढ़ा दी।’ आज मैं दक्षिणवालों के दिलों में अपने प्रति जो प्रेम और श्रद्धा का अनुभव करता हूँ, उसका कुछ श्रेय मेरे तमिल-प्रेम को ही है।

उषा दशोरा की कविता 'भाषा के कोई सरनेम नहीं होते'

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