कहाँ हौ ऐ हमारे राम प्यारे।
किधर तुम छोड़कर मुझको सिधारे।
बुढ़ापे में ये दु:ख भी देखना था।
इसी के देखने को मैं बचा था।
छिपाई है कहाँ सुन्दर वो मूरत।
दिखा दो सांवली-सी मुझको सूरत।
छिपे हो कौन-से परदे में बेटा।
निकल आवो कि अब मरता हूँ बुड्ढा।

बुढ़ापे पर दया जो मेरे करते।
तो बन की ओर क्यों तुम पैर धरते।
किधर वह बन है जिसमें राम प्यारा।
अजुध्या छोड़कर सूना सिधारा।
गई संग में जनक की जो लली है।
इसी में मुझको और बेकली है।
कहेंगे क्या जनक यह हाल सुनकर।
कहाँ सीता कहाँ वह बन भयंकर।

गया लछमन भी उसके साथ-ही-साथ।
तड़पता रह गया मैं मलते ही हाथ।
मेरी आँखों की पुतली कहाँ है।
बुढ़ापे की मेरी लकड़ी कहाँ है।
कहाँ ढूंढ़ौं मुझे कोई बता दो।
मेरे बच्चो को बस मुझसे मिला दो।
लगी है आग छाती में हमारे।
बुझाओ कोई उनका हाल कह के।

मुझे सूना दिखाता है ज़माना।
कहीं भी अब नहीं मेरा ठिकाना।
अंधेरा हो गया घर हाय मेरा।
हुआ क्या मेरे हाथों का खिलौना।
मेरा धन लूटकर के कौन भागा।
भरे घर को मेरे किसने उजाड़ा।
हमारा बोलता तोता कहाँ है।
अरे वह राम-सा बेटा कहाँ है।

कमर टूटी, न बस अब उठ सकेंगे।
अरे बिन राम के रो-रो मरेंगे।
कोई कुछ हाल तो आकर के कहता।
है किस बन में मेरा प्यारा कलेजा।
हवा और धूप में कुम्हला के थककर।
कहीं साये में बैठे होंगे रघुवर।
जो डरती देखकर मट्टी का चीता।
वो वन-वन फिर रही है आज सीता।

कभी उतरी न सेजों से जमीं पर।
वो फिरती है पियोदे आज दर-दर।
न निकली जान अब तक बेहया हूँ।
भला मैं राम-बिन क्यों जी रहा हूँ।
मेरा है वज्र का लोगो कलेजा।
कि इस दु:ख पर नहीं अब भी य फटता।
मेरे जीने का दिन बस हाय बीता।
कहाँ हैं राम लछमन और सीता।

कहीं मुखड़ा तो दिखला जायें प्यारे।
न रह जाये हविस जी में हमारे।
कहाँ हो राम मेरे राम ये राम।
मेरे प्यारे मेरे बच्चे मेरे श्याम।
मेरे जीवन मेरे सरबस मेरे प्रान।
हुए क्या हाय मेरे राम भगवान।
कहाँ हो राम हा प्रानों के प्यारे।
यह कह दशरथ जी सुरपुर को सिधारे।

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है।

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