‘Desh Aur Hum’, a poem by Harshita Panchariya

छात्र मासूम होते हैं।
इतने मासूम कि
बस्तों में किताबों की जगह रॉड और डण्डे बसते हैं।

लेखक संवेदनशील होते हैं।
इतने संवेदनशील कि क़लम की नीली स्याही से संवेदनहीन ख़ून उगलते हैं।

बुद्धिजीवी तार्किक होते हैं।
इतने तार्किक कि कुतर्कों से भरे सिद्धांत थोपते रहते हैं।

राजनीतिज्ञ सामाजिक होते हैं।
इतने सामाजिक कि समाज को बाँटकर अपनी गोट बिछाते रहते हैं।

आम लोग धार्मिक होते हैं।
इतने धार्मिक कि धर्म के नाम पर देश खोखला कर सकते हैं।

जबकि होना ये चाहिए कि धर्म के नाम पर देश खोखला करने वालों को तर्कों के आधार पर बाँटकर किताबें पकड़ा देनी चाहिए थी ताकि समाज में संवेदनशीलता की बुनियाद बनी रहे।

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