क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है।
बिन अदालत औ मुवक्किल के मुक़दमा पेश है।
आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है, जी चाहा नक़्शा पेश है।
क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है।

हैं सभी माहिर उगाने
में हथेली पर फ़सल
औ हथेली डोलती दर-दर बनी दरवेश है।
क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है।

पेड़ हो या आदमी
कोई फ़रक़ पड़ता नहीं
लाख काटे जाइए, जंगल हमेशा शेष है।
क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है।

प्रश्न जितने बढ़ रहे
घट रहे उतने जवाब
होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है।
क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है।

खूँटियों पर ही टँगा
रह जाएगा क्या आदमी?
सोचता, उसका नहीं यह खूँटियों का दोष है।
क्या ग़ज़ब का देश है, यह क्या ग़ज़ब का देश है।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता 'देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता'

Book by Sarveshwar Dayal Saxena: