धर्म और युवा

‘Dharm Aur Yuva’, an essay by Nishant Upadhyay

आज़ादी के बाद से इस देश की दो परिभाषाएँ चली आ रही हैं। एक परिभाषा, प्राचीन समय की आवाज़ सी, दुनिया भर में गूँजती है और दूसरी, किसी लोकगीत की तरह, हर नुक्कड़ पर सुनायी देती है।

हमारा देश धर्म का देश है। हमारा देश युवाओं का देश है। इन दोनों परिभाषाओं में मुझे एक मौलिक सम्बन्ध दिखायी पड़ता है। समय के झंझावात के बीच से निकला हुआ एक पुल इन दो शब्दों को जोड़ता है। धर्म और युवा। ये दोनों चीज़ें एक दूसरे से निर्धारित होती हैं। हम दोनों ही परिभाषाओं की ज़मीन पर एक सुंदर भविष्य की इमारत रख सकते थे। ये बात और है कि हम इसमें बड़े स्तर पर विफल हुए हैं। इस विफलता की पैठ तक पहुँचने की यात्रा में कई नये पड़ाव मिलते हैं, जिनसे आगे की राह तय की जा सकती है।

इस देश में धर्म का उदय, सभ्यता की नींव पड़ते ही, शुरू हो गया था। ख़ानाबदोशी और घुमंतु आदतों से निकलकर जब मनुष्य एक जगह टिककर रहने लगा तो सभ्यता ने जन्म लिया। सभ्यता सिर्फ़ झोपड़ियों के खड़े होने से नहीं जी सकती थी। उसके चारों ओर संस्कृति की बागड़ बनायी गई। इस प्रक्रिया में मनुष्य के मस्तिष्क का भी विकास हुआ। प्राकृतिक चीज़ों, जैसे बिजली, बारिश, आँधी, बाढ़ से वह हमेशा से डरता आया था। धीमे धीमे वह प्रकृति को अपने से बड़ा जानने लगा।

प्रकृति को धन्यवाद ज्ञापित करने और उसके प्रकोप से बचने के लिए किये गए ठठकर्मों ने नियमों को स्थापित किया। मनुष्य की इन प्रथम चेष्टाओं में ही, प्रकृति और पुरुष की, शुरूआत छुपी थी। जो आज भी कई सारे धर्मों और दर्शनों में परिलक्षित होती है। उसके बाद नाना रास्तों में बँटते हुए धर्म के विद्यालय शुरू हो चुके थे। ये व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर आमूलचूल अंतर पैदा कर रहे थे।

इन सारे नियमों और परिवर्तनों में एक शक्ति छुपी हुई थी। वह थी समकालीन युवा शक्ति। समय की नदी जैसे जैसे आगे बह रही थी, उसमें धर्म के लठ्ठे बहाने वाले युवा ही थे। किसी भी विमर्श को भविष्य में जाने से सिर्फ़ युवा रोक सकते थे। किसी एक पीढ़ी के संगठित विद्रोह की दीवार भविष्य का आईना पलट सकती थी। हालांकि इसका ठीक विपरीत हुआ। युवाओं ने धर्म को बढ़ाने में मध्यस्थता की। इसके आदि कारणों में ना जाकर इसके प्रभाव को देखा जाना चाहिये।

कई युवा पीढ़ियाँ, हज़ारों वर्षों तक, इस परम्परा को आगे बढ़ाती रहीं। धर्म अपने मूल अर्थ से बाहर निकल रहा था पर उसे साधने के लिये वाद-संवाद की मानुषिक प्रवृत्ति प्रयासों में लगी रही। शनैः शनैः इस प्रवृत्ति का क्षरण होने लगा और इसकी जगह धर्मभीरुता ने ले ली। पुरानी पीढ़ी की धार्मिक विरासतों में से प्रश्नोत्तर की परम्परा ग़ायब हो गई थी। आने वाले युवाओं ने सिर्फ़ इन रूढ़ियों को बढ़ाने का काम किया। कुछ विलक्षण प्रतिभाओं के धनी युवाओं ने ज़रूर अपना दर्शन स्थापित किया पर उन्हें भी मैं अपवाद नहीं मानता। गौतम बुद्ध ने ब्राहमणवाद से ग्रसित समाज को ज़रूर एक नये दर्शन से उभारा परंतु वो भी मृत्यु के बाद की अलौकिक जगह और किसी अलौकिक शक्ति को मानने से रुक नहीं पाये। ये हज़ारों सालों की धर्मभीरुता के वज़न का ही प्रकोप था कि हमने अपनी सुलभताओं के हिसाब से अपने प्रश्न गढ़े। धर्म अपने मूल स्वरूप से हटकर, हितों और हठों को साधने का साधन बन गया। इसी वजह से युवा वर्ग कभी अपेक्षित क्रांति नहीं कर पाया। यही धर्मभीरुता आगे जाकर राजनैतिक दासता का कारण बनी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी जहाँ नेताओं ने समाज को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी ली, वहीं धर्म के बिखरे स्वरूप को ही प्रयोग में ले आए। वेदांत को सबसे उच्च स्थान पर और पुराणों को सवालों के दायरे से बाहर रखा। मिमांशा जैसे दर्शन भी समसामायिक दवाब में आ चुके थे।

बड़ी दुखद बात है कि आज युवाओं के एक बड़े तबके को धर्मांध और धर्मोन्मादी देखकर आश्चर्य नहीं होता है। हमने संवादों को विवादों की शक्ल दे दी है। धर्म सभ्यता के विकास का पहिया ना होकर एक शिलापट बन चुका है। स्थिर। इसे नदी के बजाय कोई रुकी हुई झील के पानी सा बनाया जा रहा है। धर्मो रक्षति रक्षत: और ज़िहाद के मतलब तोड़ मरोड़कर, ज़हर की घुट्टी पिलायी जा रही है।

एक दूसरा तबका भी है जिसने धर्म से अपना पल्ला झाड़ लिया है। ये भी दिशाभ्रमित सिपाही हैं। इनकी दूरदृष्टि में धर्म के साथ साथ सभ्यता भी पिस जाती है। साथ ही संस्कृति का विनाश होता है। इन्हें भी धर्म का अर्थ समझने की आवश्यकता है जिससे ये ज़मीनी परिवर्तन ला सकें। किसी चीज़ को समझना उसे मानना नहीं होता, ये समझ हमारे पढ़े लिखे युवाओं को विकसित करनी ही होगी।

हिंदुस्तानी समाज में धर्म की अवधारणा बहुत अंदर तक बसी हुई है। हमें धर्म के मूल स्वरूप में पहुँचने के लिये इसका सूक्ष्म विश्लेषण करना होगा। हमें अपनी सुलभता से दूर हो औरों के कष्टों तथा अत्याचारों के पैमाने पर धर्म को नापना होगा। उसमें से अपने समय के अनुरूप काट छाँट करनी होगी और एक ऐसा लिबास तैयार करना होगा जो हमारी सभ्यता और संस्कृति के मानवीय मूल्यों को समा पाये। हमें युवाओं को धर्म से जोड़ना ज़रूर होगा मगर भक्त बन कर नहीं। सवालों, जिरह और संवादों के तौर पर। एक वैज्ञानिक समझ पैदा करने की ज़रूरत है जहाँ युवा किसी भी तरह के प्रोपोगैंडा के प्यादे बने ना रहें।

सभी धर्म अंत में प्रकृति को प्रभुत्व प्रदान करते हैं। ऐसे में मनुष्य की वैज्ञानिक जिज्ञासा की कसौटी पर धर्म को ना रखना, पुरुष धर्म से मुँह फेरना होगा।

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