धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती है
एक छाया सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती है

यह दिया चौरास्ते का ओट में ले लो
आज आँधी गाँव से होकर गुज़रती है

कुछ बहुत गहरी दरारें पड़ गईं मन में
मीत अब यह मन नहीं है, एक धरती है

कौन शासन से कहेगा, कौन पूछेगा
एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है

मैं तुम्हें छूकर ज़रा-सा छेड़ देता हूँ
और गीली पाँखुरी से ओस झरती है

तुम कहीं पर झील हो, मैं एक नौका हूँ
इस तरह की कल्पना मन में उभरती है!

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दुष्यन्त कुमार
दुष्यंत कुमार त्यागी (१९३३-१९७५) एक हिन्दी कवि और ग़ज़लकार थे। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ ४२ वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।