कुछ दिन हुए, रामानंदजी और राकेशजी अपने-अपने पेशे से रिटायर होकर सिविल लाइंस में बस गए थे। अपने यहाँ का चलन है कि रिटायर होने के बाद और इस लोक से ट्रांसफ़र होने के पहले बहुत से लोग सिविल लांइस में बँगले बनवा लेते हैं। इन्होंने भी वहाँ अपने-अपने बँगले बनवा लिए।

रामानंदजी किसी समय में चोरी किया करते थे। वे पुराने स्कूल के चोर थे। इस कारण उनका विश्वास तांत्रिक क्रियाओं में भी था। बाद में चोरी सिखलाने के लिए उन्होंने एक नाइट स्कूल भी खोला। कुछ समय बीतने पर चोरी के माल के क्रय-विक्रय की उन्होंने एक दुकान कर ली। इस सबसे अब वे रिटायर हो चुके थे और अपने को रिटायर कहा करते थे।

राकेशजी रिटायर तो हो चुके थे, पर चूँकि वे कवि थे, इस कारण वे अपने को रिटायर मानने को तैयार न थे। कभी उन्होंने एम.ए. पास किया था; और फिर वे एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर हो गए थे। उस पेशे में तो वे ज़्यादा नहीं चल पाए पर कवि की हैसियत से उन्हें ऊँचा स्थान मिल गया था। अर्थात अब तक उनके पास उनकी अपनी कविताएँ थी, अपने प्रकाशक थे, अपने ही आलोचक थे, अपने ही प्रशंसक और पुरस्कारदाता थे। इधर कुछ आलोचक उन्हें कविता के क्षेत्र में भी रिटायर कहने लगे थे।

दोनों पड़ोसी थे। दोनों को एक-दूसरे के पुराने व्यवसाय का ज्ञान था। उनमें मित्रता हो गई। दोनों प्रायः हर बात में एकमत रहते थे। दोनों यही समझते थे कि इस युग में योग्यता और कला का ह्रास हो रहा है और आज की पीढ़ी बिल्कुल जाहिल, निरर्थक और अयोग्य है। इसीलिए एक दिन लॉन में टहलते-टहलते राकेशजी ने कहा, “आज की पढ़ाई में रक्खा ही क्या है? मैं आठवें दर्जे में हिन्दी कविता का अर्थ अंग्रेज़ी में लिखता था। अब बी.ए. में अंग्रेज़ी कविता का अर्थ हिन्दी में लिखाया जाता है।”

रामानंदजी बोले, “आप ठीक कहते हैं। हमारे ज़माने में कुछ लोग फ़र्श पर डंडा ठोंककर ज़मीन में गड़े हुए धन का हाल जान लेते थे। आज के दिन सामने कपड़े से ढँकी तिजोरी रक्खी रहती है और लोग उसे मेज़ समझकर बिना छुए ही निकल जाते हैं।”

राकेशजी ने कहा, “और जमकर साधना करने का तो समय ही चला गया है। आजकल…।”

बात काटकर रामानंदजी बोले, “साधना अब कौन कर सकता है? हम लोगों ने अमावस की रात में मसान जगाया था। मुर्दे की खोपड़ी में चावल पकाकर उसे जिस घर में डाल देते, वहाँ का माल…।”

राकेशजी ने जल्दी में कहा, “नहीं नहीं, वैसी साधना से मेरा मतलब नहीं है। मैं साहित्य-साधना की बात कर रहा हूँ। आजकल लोग व्याकरण, पिंगल, काव्यशास्त्र का नाम तक नहीं जानते और नई-नई बातों के आविष्कारक बन जाते हैं। कोई दो-दो पंक्तियों को लिए मुक्तक लिख रहा है, अतुकांत चला रहा है, कोई क्रियाओं के नए-नए प्रयोग भिड़ा रहा है : और पूछ बैठिए कि अकर्मक क्रिया और सकर्मक क्रिया में क्या भेद है तो अंग्रेज़ी बोलने लगेंगे।”

एक गहरी साँस खींचकर रामानंदजी बोले, “आप सच कहते हैं, अपने यहाँ भी यही दशा है। दीवाल की कौन कहे, काग़ज़ पर क़ायदे की सेंध नहीं लगा सकते और बात करेंगे सिटकनी खोलने की, रोशनदान तोड़ने की, जेब काटने की। नई-नई तरकीबों की डींग हाँकेंगे। और पुरानी…।”

राकेशजी अपनी धुन में कहते गए, “और विनम्रता तो रही ही नहीं। कुछ सिखाओ तो सीखेंगे नहीं। कुछ बताओ तो बिना समझे-बूझे अकड़ने लगेंगे। आज के साहित्यिक, साहित्यिक नहीं—लठैत हैं, लठैत।”

रामानंदजी समर्थन करते हुए बोले, “साहित्यिकों के क्या पूछने राकेशजी। यहाँ तो अबके चोर नहीं रहे। वे तो डकैत हैं, डकैत। अपना पुराना तरीक़ा तो यह था कि घर में घुसे और बच्चे ने खाँस दिया तो विनम्रतापूर्वक बाहर निकल आए। पर आजकल के ये लोग किसी को जागता हुआ पा जाएँ तो…”

सहमकर उन्होंने वाक्य पूरा किया, “बाप रे बाप…”

अब राकेशजी उत्साहित हो गए और बोले, “ये सब जाहिल हैं, निरर्थक हैं। पहले तो लिखते-लिखते हाथ ऐसा मँज जाता था कि पाठक बिना पढ़े ही दूर से समझ जाते थे कि अमुक कवि की कविता है। उस पर उनका व्यक्तित्व झलकता था…।”

रामानंदजी ने धीरे से कहा, “यही तो। सेंध की शकल देखकर लोग कह देते थे कि यह फँला ने लगायी है। अब तो सिटकनी खुली पड़ी है…।”

उपमा राकेशजी को पसंद आ गई। “बोले, “आजकल यही तो है ही। साहित्य के दरवाज़े की सिटकनी अंदर से खोल-खोलकर न जाने कितने लोग घुस आए हैं।”

बिन समझे हुए, रामानंद जी ने कहा, “जी हाँ, पहले तो सेंध का ही चलन था।”

राकेशजी ने जल्दी से कहा, “जी, आप मेरा मतलब नहीं समझे। मैं कहा रहा था कि…।”

अकस्मात उन्होंने चौंककर कुरते की जेब पकड़ ली। रामानंदजी का हाथ उनकी मुट्ठी में आ गया। नाराज़गी से राकेशजी बोले, “यह क्या? आप मेरी जेब काट रहे थे।”

रामानंदजी ने विनम्रता से हाथ छुड़ाकर कहा, “यही समझ लीजिए। बात यह है कि… बात यह है कि ये नौसिखिए कुछ काम तो बड़ी सफ़ाई से कर दिखाते हैं। मैं आपस में वही देख रखा था कि यह जेब वाला काम मुझसे भी चल पाता या नहीं।”

रामनंदजी नर्म पड़े। बोले, “देख लिया आपने।”

बिना उत्साह के, रामानंदजी साँस खींचकर बोले, “देख लिया राकेशजी! यह सब के बूते की बात नहीं। जो हम ने कर लिया, वह आज वाले नहीं कर पाते हैं। पर इनके भी कुछ ऐसे खेल हैं जो हम नहीं खेल पाते। अपना-अपना ज़माना है।”

सहसा राकेशजी बिगड़कर बोले, “यह सब आप ही के यहाँ चलता होगा। अपने यहाँ तो अब भी जो कहिए, करके दिखा दूँ। रामानंदजी, यह तो करने की विद्या है। चाहे कवित्व हो, चाहे कविता हो, या हो नई कविता। लिखूँगा तो अब भी आजकल वालों से अच्छा ही लिखूँगा।”

रामानंदजी राकेशजी की ओर देखते रहे। उनमें कभी मतभेद नहीं हुआ था। पहली बार उन्हें लगा कि कुछ ऐसी भी बातें हैं जहाँ उनकी राय हमेशा एक नहीं होगी।

श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य 'अंगद का पाँव'

Book by Shrilal Shukla:

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श्रीलाल शुक्ल
श्रीलाल शुक्ल (31 दिसम्बर 1925 - 28 अक्टूबर 2011) हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। वह समकालीन कथा-साहित्य में उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये विख्यात थे। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

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