दो दुनिया

‘Do Duniya’, a poem by Niki Pushkar

मेरी यह यात्रा दो दुनिया की है
एक दुनिया,
जो मेरे अन्तस की है
जहाँ,
ख़याली-आवास है मेरा
वहाँ तुम्हारी नागरिकता बेशर्त मान्य है
तुम उसके बाशिन्दे रहो
वहाँ प्रश्न नहीं हैं
वहाँ आपत्तियाँ नहीं हैं
वहाँ बाधाएँ नहीं हैं

दूसरी दुनिया,
जहाँ मैं सशरीर रहती हूँ,
इसके क़ायदों में
तुमसे मिलने की कोई राह नहीं
यदि, यहाँ तुम साथ चले
तो पहचानी राहें,
अज़नबी हो जाएँगी
सीधी दृष्टियाँ वक्र हो जाएँगी
हर ज़ुबाँ पर
प्रश्नों और तोहमतों का अम्बार लग जाएगा
यकायक चरित्र
संदेह के घेरे में आ जाएँँगे
दोस्त!
तुम मुझसे वहीं
मेरे अन्तस-नगर में मिलना
जहाँ मन के रिश्तों के नाम
अपेक्षित नहीं!

08/12/2019

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