वो एक रिदम में लड़ते थे
उसी रिदम में मान जाते थे
और जीने लगते थे साथ दूसरी रिदम में,
तीसरी रिदम में कभी-कभी सुनाई देता था मुझे उनकी आँखों में प्यार
तब पापा मुझे अनिल कपूर और अम्मा माधुरी दीक्षित लगती थीं
ये मेरी नज़र में उनकी चौथी रिदम थी
प्यार, गीत-संगीत से ये मेरा पहला परिचय था
फिर मैंने खोजी वो आँखें जिनमें ये सब कुछ हो
पर हर दफ़ा मैं ताल में होते हुए बेताला हुआ!
मन, झूठ नहीं बोलता ये मैंने तभी जाना,
और देखता रहा पलट कर उन्हें बार-बार
कि ज़िन्दगी के सबसे बेताले समय में भी वो लोग ताल पर कैसे बने रहे?
फिर मेरी ज़िन्दगी में तुम आईं
जैसे पापा की ज़िन्दगी में आईं होंगी अम्मा!
अब हम एक रिदम में लड़ना
दूसरी रिदम में जीना, तीसरी रिदम में प्यार करने का अभ्यास कर रहे हैं,
कभी-कभी इस अभ्यास में तुम अम्मा और मैं पापा जैसे दिखने लगता हूँ!
तो आओ आज उनका अनकहा प्यार कुबूलें
और मैं पापा के हिस्से का अनिल कपूर होकर गाऊं-
‘कोयक सी तेरी बोली कुहू-कु कु कु कु
सूरत है कितनी भोली कुहू-कु कु कु कु’
और तुम माधुरी हो कर अम्मा के हिस्से का जवाब दो
‘बातों में तेरी सागर कुहू-कु कु कु कु
मन को लुभाये प्रीतम कुहू -कु कु कु कु’

भले प्रेम आगे की तरफ़ भागता है, पर
प्रेम में वापस लौटना, जड़ों की तरफ़ लौटना है।

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देवेन्द्र अहिरवार
छतरपुर ज़िले के 'पहरा' गांव से हूँ, 2012 में मध्यप्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा के पहले बैच से पास आउट, 2017 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से डिज़ाइन और डिरेक्शन से स्नातक लिखता हूँ- स्क्रिप्ट, कविताएं, गाने। गाता हूँ, म्यूज़िक बनाता हूँ मंडी हाउस दा बैंड का फाउंडर हूँ डिज़ाइन और डिरेक्ट करता हूँ इतना कुछ करता हूँ कि कुछ भी ठीक से नहीं कर पाता प्रेम के अलावा दोस्त कहते थे कि 70 MM के पर्दे पर तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगेगा, इसी लिए मुम्बई में हूँ और मैं किताब पर अपना नाम लिखा देखना चाहता हूँ, पर कोई पब्लिकेशन इंटरेस्ट नही दिखा रहा है!