दोज़ख़ी

‘Dozakhi’, a Memoir (Sansmaran) by Ismat Chughtai

जब तक कॉलेज सर पर सवार रहा, पढ़ने-लिखने से फुर्सत ही न मिली जो साहित्य की ओर ध्यान दिया जाता। और कॉलेज से निकलकर बस दिल में यही बात बैठ गयी कि हर वह चीज़ जो दो साल पहले लिखी गयी, पुरानी, बे-रस और झूठी है और नया साहित्य सिर्फ़ आज और कल में मिलेगा। इस नये साहित्य ने इस क़दर गड़बड़ाया कि न जाने कितनी किताबें सिर्फ़ नाम देखकर ही वाहियात समझ कर फेंक दीं और सबसे ज़्यादा बेकार किताबें जो नज़र आयीं, वो अज़ीमबेग चग़ताई की। ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ वाली बात! घर के हर कोने में उनकी किताबें मारी-मारी फिरतीं। मगर सिवाय अम्माँ और दो-एक पुराने फैशन की भाभियों के किसी ने उठाकर भी न देखीं। यही ख़याल होता, भला इनमें होगा ही क्या। यह साहित्य नहीं, फूहड़ मज़ाक, पुराने इश्क़ के सड़ियल क़िस्से और जी जलाने वाली बातें होंगी। यानी बे-पढ़े राय कायम! मुझे ख़ुद यह बात समझ में नहीं आयी कि मैंने अज़ीम भाई की किताबें क्यों न पढ़ीं? शायद इसमें थोड़ा-सा घमण्ड भी शामिल था और अहं भी! यह ख़याल होता था, ये पुराने हैं, हम नये!

एक दिन योंही लेटे-लेटे उनका एक मज़मून ‘इक्का’ नज़र आया। मैं और असीम भाई पढ़ने लगे। न जाने किस धुन में थे कि हँसी आने लगी और इस क़दर आयी कि पढ़ना कठिन हो गया। हम पढ़ ही रहे थे। कि अज़ीम भाई आ गये और अपनी किताब पढ़ते देखकर खिल उठे। मगर हम जैसे चिढ़ गये और मुँह बनाने लगे। वो एक ही होशियार थे। बोले, “लाओ, मैं तुम्हें सुनाऊँ।” और यह कह कर दो-एक मज़मून जो हमें सुनाये तो सही मानी में हम ज़मीन पर लोटने लगे। सारी बनावट ग़ायब हो गयी। एक तो उनके मज़मून और फिर उनकी ही ज़बानी। लगता था कि हँसी की चिनगारियाँ उड़ रही हैं। जब वो खूब अहमक़ बना चुके तो बोले, “तुम लोग तो कहते हो, मेरे मज़मूनों में कुछ नहीं होता।” और उन्होंने छेड़ा। हमारे मुँह उतरकर ज़रा-ज़रा से निकल आये और हम बेतरह चिढ़ गये। झुँझलाकर उलटी-सीधी बातें करने लगे। जी जल गया, और फिर इसके बाद उनकी किताबों से और भी नफ़रत हो गयी।

मैंने उनकी रचनाओं की उनकी ज़िन्दगी में कभी प्रशंसा न की, हालाँकि वो मेरे मज़मून देखकर ऐसे खुश होते थे कि बयान नहीं। इस क़दर प्यार से तारीफ़ करते थे। मगर यहाँ तो उनकी हर बात से चिढ़ने की आदत थी। मैं समझती थी कि वो मेरा मज़ाक़ उड़ाते हैं। और बख़ुदा जब वह शख़्स किसी का मज़ाक़ उड़ाता था तो जी चाहता था, बच्चों की तरह मचल जायें और रोयें। किस क़दर व्यंग्य, कैसी कड़वी मुस्कराहट और काटते हुए वाक्य। मैं तो हर वक़्त डरती थी कि मेरा मज़ाक़ उड़ाया और मैंने बदज़बानी की।

कभी कहते थे, “मुझे डर लगता है कि कहीं तुम मुझसे अच्छा न लिखने लगो।” और मैंने सिर्फ चन्द मज़मून लिखे थे, इसलिए जी जलता था कि ये मेरा मज़ाक़ उड़ा रहे हैं।

उनके देहान्त के बाद न जाने क्यों, मरने वाले की चीज़ें प्यारी हो गयीं। उनका एक-एक लफ़्ज़ चुभने लगा। और मैंने उम्र में पहली बार उनकी किताबें दिल लगाकर पढ़ीं। दिल लगा कर पढ़ने की भी खूब रही। गोया दिल लगाने की भी ज़रूरत थी। दिल आप-से-आप खिंचने लगा। ओफ़्फ़ोह! तो यह कुछ लिखा है इन मारी-मारी फिरने वाली किताबों में! एक-एक शब्द पर उनकी तस्वीर आँखों में खिंच जाती और पल भर में वो ग़म और दुख में डूबी हुई, मुस्कराने की कोशिश करती हुई आँखें, दुखभरी काली घटाओं की तरह मुरझाये हुए चेहरे पर पड़े हुए वो घने बाल, वो पीला नीलाहट लिये हुए ऊँचा माथा, उदास ऊदे होंठ, जिनके अन्दर समय से पहले तोड़े हुए असमतल दाँत और दुर्बल, सूखे-सूखे, औरतों-जैसे नाज़ुक, और दवाओं में बसी हुई लम्बी उँगलियों वाले हाथ। और फिर उन हाथों पर सूजन आ गयी थी। पतली-पतली खपच्ची-जैसी टाँगे, जिनके सिरे पर वरम से सूजे हुए भद्दे पैर, जिन्हें देखने से बचने के लिए हम लोग उनके सिरहाने की तरफ़ ही जाया करते थे और सूखे हुए पिंजर-जैसे सीने पर धौंकनी का सन्देह होता था। कलेजे पर हज़ारों कपड़ों, बनियानों की तहें और इस सीने में ऐसा फड़कता हुआ चुलबुला दिल! या अल्लाह, यह आदमी क्योंकर हँसता था। लगता था, कोई भूत है या जिन्न, जो हर ख़ुदाई ताक़त से कुश्ती लड़ रहा है। नहीं मानता, मुस्कराये जाता है। ज़ालिम और जाबिर ख़ुदा चढ़-चढ़ कर खाँसी और दमे की यन्त्रणा दे रहा है और यह दिल ठहाके लगाना नहीं छोड़ता। कौन सा दुनिया और दीन का दुख था, जो कुदरत ने बचा रखा था, फिर भी रुला न सकी। इस दुख में, जलन में हँसते ही नहीं, हँसाते रहना किसी इन्सान का काम नहीं। मामू कहते थे, ‘ज़िन्दा लाश।’ ख़ुदाया! अगर लाशें भी इस क़दर जानदार, बेचैन और फड़कने वाली होती हैं तो फिर दुनिया एक लाश क्यों नहीं बन जाती!

मैं एक बहन की हैसियत से नहीं, औरत के रूप में उनकी तरफ़ नज़र उठाकर देखती तो दिल काँप उठता था। किस कदर ढीठ था उनका दिल! उसमें कितनी जान थी! मुँह पर गोश्त नाम को न था। मगर कुछ दिन पहले चेहरे पर वर्म आ जाने से चेहरा ख़ूबसूरत हो गया था। कनपटियाँ भर गयी थीं। पिचके हुए गाल उभर आये थे। एक मौत की-सी चमक चेहरे पर आ गयी थी। और रंगत में भी कुछ अजब तिलिस्मी सब्ज़ी-सी आ गयी थी, जैसे मसाला लगी हुई ममी! मगर आँखें—लगता था किसी बच्चे की नटखट आँखें—जो ज़रा-ज़रा-सी बात पर नाच उठती थीं और फिर कभी उनमें नौजवानों की-सी शोख़ी जाग उठती थी। और यही आँखें कभी खाँसी के दौरे की शिद्दत से घबराकर चीख़ उठतीं। उनकी साफ़, स्वच्छ, नीली सतह पीली गँदली हो जाती और अशक्त हाथ काँपने लगते। सीना फटने पर आ जाता। दौरा ख़त्म हुआ कि फिर वही रोशनी, फिर वही नाच, फिर वही चमक!

अभी चन्द दिन हुए, मैंने पहली बार ‘ख़ानम’ (यह पुस्तक हिन्दी में ‘श्रीमती जी’ के नाम से छपी है) पढ़ी। हीरो वे ख़ुद नहीं। उनमें इतनी जान ही कब थी। मगर वह हीरो उनकी कल्पना का नायक है। वह उनकी दबी हुई भावनाओं की काल्पनिक तस्वीर है। जैसे एक लँगड़ा सपनों में स्वयं को नाचता, कूदता, दौड़ता हुआ देखता है। ऐसे ही वो बीमारी में गिरफ़्तार निढाल पड़े अपने हमज़ाद (प्रतिच्छाया) को शरारतें करते देखते थे। काश, एक बार और सिर्फ़ एक बार उनकी ‘ख़ानम’ उस हीरो को देख लेती।

शायद औरों के लिए ‘ख़ानम’ कुछ भी नहीं। लेकिन सिवाय लिखने वाले के शेष सारे पात्र यथार्थ और जीवित हैं। भाई साहब, भाई जान, नानी अम्माँ, शेख़ानी, वालिद साहब, भतीजे, भंगी, भिश्ती—ये सब-के-सब हैं और रहेंगे। यही होता था, बिलकुल यही और अब भी सब घरों में ऐसा ही होता है। कम-से-कम मेरे घर में तो था और एक-एक शब्द घर की सच्ची तस्वीर है। जब अज़ीम बेग लिखते थे तो सारा घर और हम सब उनके लिए ऐक्टिंग किया करते थे। हम हिलते-जुलते खिलौने थे और वो एक नक़्क़ाश, जिसने बिलकुल असल की नक़ल कर दी। जितनी बार ‘ख़ानम’ को पढ़ती हूँ, यही लगता है, ख़ानदान का ग्रुप देखती हूँ—वो भाभी जान और ख़ानम झगड़ रही हैं। वो भाई साहब शरारतें ईजाद कर रहे हैं और लेखक ख़ुद? सर झुकाये ख़ामोश तस्वीर खींचने में निमग्न है।

‘खुरपा बहादुर’, जिसका पहला टुकड़ा ‘रूहे-लताफ़त’ में छपा है, यह सब काल्पनिक है। लाचार-मजबूर इन्सान अपने हमज़ाद से दुनिया-जहान की शरारतें करवा लेता है। वह ख़ुद तो दो क़दम नहीं चल सकता, लेकिन हमज़ाद चोरियाँ करता है, शरारतें करता है। खुद तो एक उँगली का बोझ नहीं सहार सकता, पर हमज़ाद जी भरकर मार खाता है और टस से मस नहीं होता। लेखक को अरमान था कि काश वो भी इतना मज़बूत होता, दूसरे भाइयों की तरह! डेढ़-डेढ़ सौ जूते खाकर कमर झाड़ कर उठ खड़ा होता। तन्दुरुस्त लोग क्या जानें एक बीमार के दिल में क्या-क्या अरमान होते हैं। परकटा पक्षी वैसे नहीं, पर सपनों में तो दुनिया भर की सैर कर आता है। यही हाल उनका था। वो जो कुछ न थे, कहानियों में वही बनकर मन की आग बुझा लेते थे। कुछ तो चाहिए न जीने के लिए!

शुरू से ही रोते-धोते पैदा हुए। रुई के गालों पर रखकर पाले गये। कमज़ोर देखकर हर एक माफ़ कर देता। लम्बे-तगड़े भाई सर झुकाकर पिट लेते। कुछ भी करें वालिद साहब कमज़ोर जानकर माफ़ कर देते। हर एक दिल बहलाने में लगा रहता। मगर बीमार को बीमार कहो तो उसे खुशी कब होगी। इन मेहरबानियों से हीन भाव और बढ़ता। विद्रोह और बढ़ता, गुस्सा और बढ़ता। मगर बेबस। सब ने उनके साथ गांधी जी वाली अहिंसा शुरू कर दी थी। वो चाहते थे, कोई तो उन्हें भी इन्सान समझे, उन्हें भी कोई डाँटे, उन्हें भी कोई ज़िन्दा लोगों में गिने। इसलिए एक तरकीब निकाली और वह यह कि फ़सादी बन गये। जहाँ चाहा, दो आदमियों को लड़ा दिया। अल्लाह ने दिमाग़ दिया था और फिर उसके साथ-साथ बला की कल्पना-शक्ति और तेज़ ज़बान। चटखारे ले-ले कर कुछ ऐसी तरकीबें चलते कि झगड़ा ज़रूर होता। बहन-भाई, माँ-बाप, सब को नफ़रत हो गयी। अच्छा-ख़ासा घर मैदाने-जंग बन गया। और सब मुसीबतों के ज़िम्मेदार ख़ुद। बस उनका अहं संतुष्ट हो गया और कमज़ोर, लाचार, हरदम का रोगी थियेटर का खलनायक हीरो बन गया, और क्या चाहिए। सारी कमज़ोरियाँ हथियार बन गयीं। ज़बान बद से बदतर हो गयी। दुनिया में हर कोई नफ़रत करने लगा। सूरत से जी मतलाने लगा। हँसते-बोलते लोगों को दम भर में दुश्मन बना लेना बायें हाथ का काम हो गया।

लेकिन उद्देश्य यह तो न था कि सचमुच दुनिया उन्हें छोड़ दे। घर वालों ने जितना उनसे खिंचना शुरू किया, उतना ही वो लिपटे। आख़िर में तो ख़ुदा माफ़ करे, उनकी सूरत देखकर नफ़रत होती थी। वो लाख कहते, मगर दुश्मन नज़र आते थे। बीवी शौहर न समझती, बच्चे बाप न समझते, बहन ने कह दिया, तुम मेरे भाई नहीं और भाई आवाज़ सुनकर नफ़रत से मुँह मोड़ लेते। माँ कहती- ‘साँप जना था मैंने!’

मरने से पहले दयनीय हालत थी। बहन होकर नहीं, इन्सान बनकर कहती हूँ, जी चाहता था, जल्दी से मर चुकें! आँखों में दम है, पर दिल दुखाने, नहीं चूकते। दोज़ख़ का अज़ाब बन गये हैं। हज़ारों कहानियों, अफ़सानों का हीरो एक विलेन बनकर संतुष्ट हो चुका था। वो चाहता था कि अब भी कोई उसे प्यार करे, बीवी पूजा करे, बच्चे मुहब्बत से देखें, बहनें वारी जायें और माँ कलेजे से लगाये।

माँ ने सचमुच फिर कलेजे से लगा लिया। भूला-भटका रास्ते पर आ लगा। आख़िर को माँ थी। पर औरों के दिल से नफ़रत न गयी। यहाँ तक कि फेफड़े ख़त्म हो गये, वर्म बढ़ गया, आँखें चुँधिया गयीं और अन्धों की तरह टटोलने पर भी रास्ता न मिला। हीरो बनकर भी हार उनकी ही रही। जो चाहा, न मिला। उसके बदले नफ़रत, हिक़ारत, कराहत मिली। इन्सान कितना लोभी होता है। इतनी शोहरत और नाम होने के बावजूद बेइज़्ज़ती की ठोकरें खाकर जान दी। सुबह चार बजे, आज से 42 बरस पहले जो नन्हा-सा कमज़ोर बच्चा पैदा हुआ था, वह ज़िन्दगी का नाटक खेल चुका था। 20 अगस्त को सुबह छै बजे शमीम ने आकर कहा, “मुन्ने भाई ख़त्म हो रहे हैं। उठो!”

“वो कभी ख़त्म न होंगे! …बेकार मुझे जगा रहे हो।” मैंने बिगड़कर सुबह की ठंडी हवा में फिर सो जाने का इरादा किया।

“अरे कमबख्त, तुझे याद कर रहे हैं।” शमीम ने कुछ परेशान होकर हिलाया।

“उनसे कह दो अब क़ियामत के दिन मिलेंगे। …अरे शमीम वो कभी नहीं मर सकते।” मैंने विश्वास से कहा।

मगर जब नीचे आयी तो उनकी ज़बान बन्द हो चुकी थी। कमरा सामान से ख़ाली कर दिया गया था। सारा कूड़ा-कर्कट, किताबें हटा दी गयी थीं। दवा की बोतलें लाचारी की तस्वीर बनी लुढ़क रही थीं। दो नन्हें बच्चे परेशान हो-हो कर दरवाज़े को तक रहे थे। भाभी उन्हें ज़बरदस्ती चाय पिला रही थीं। आँसू बन्द थे।

“मुन्ने भाई!” मैंने उन पर झुककर कहा। एक क्षण को आँखें अपनी धुरी पर रुकीं, होंठ सिकुड़े और फिर वही दम टूटने की हालत हो गयी। हम सब बाहर बैठकर चार घंटे तक सूखे-बेजान हाथों की जंग देखते रहे। मालूम होता था मौत का फ़रिश्ता भी पस्त हो रहा है। जंग थी कि ख़त्म ही न होती थी।

“ख़त्म हो गये मुन्ने भाई।” न जाने किसने कहा।

“वो कभी ख़त्म नहीं हो सकते।” –मुझे ख़याल आया।

और आज मैं उनकी किताबें देख कर कहती हूँ, असम्भव! वो कभी नहीं मर सकते। उनकी जंग अब भी जारी है। मरने से क्या होता है। मेरे लिए तो वो मरकर ही जिये और न जाने कितनों के लिए वो मरने के बाद पैदा होंगे और बराबर पैदा होते रहेंगे। उनका सन्देश– “दुख से लड़ो, नफ़रत से लड़ो और मरकर भी लड़ते रहो!” यह कभी न मर सकेगा।

उनकी विद्रोही आत्मा को कोई नहीं मार सकता। वो नेक नहीं थे। पारसा न होते अगर उनकी सेहत अच्छी होती। वो झूठे थे, उनकी ज़िन्दगी झूठी थी। सब से बड़ा झूठ थी। उनका रोना झूठा, हँसना झूठा। लोग कहते हैं, माँ-बाप को दुख दिया, बीवी को दुख दिया, बच्चों को दुख दिया और सारे जग को दुख दिया। वो एक देव थे, जो दुनिया के लिए अभिशाप बन कर आये थे और अब दोज़ख़ (नरक) के सिवा उनका कहीं ठिकाना नहीं। अगर दोज़ख़ में ऐसे ही लोगों का ठिकाना है तो एक बार तो ज़रूर उस दोज़ख़ में जाना पड़ेगा। सिर्फ यह देखने कि जिस व्यक्ति ने दुनिया के नरक में यों हँस-हँस कर तीर खाये और तीरन्दाज़ों को कड़ुए तेल में तला, वह नरक में यमराज को क्या कुछ न चिढ़ा-चढ़ा कर हँस रहा होगा। बस मैं वह तीखी व्यंग्य से भरी हँसी देखना चाहती हूँ जिसे देखकर यमराज भी जल उठता होगा।

मुझे विश्वास है, वो अब भी हँस रहा होगा। कीड़े उसकी खाल को खा रहे होंगे, हड्डियाँ मिट्टी में मिल रही होंगी, मुल्लाओं के फ़तवों से उसकी गर्दन दब रही होगी, आरों से उसका जिस्म चीरा जा रहा होगा, मगर वह हँस रहा होगा। आँखें शरारत से नाच रही होंगी। नीले मुर्दा होंठ तल्ख़ी से हिल रहे होंगे, पर कोई उसे रुला नहीं सकता।

वह आदमी, जिसके फेफड़ों में नासूर, टाँगें अर्से से अकड़ी हुई, बाँहें इंजेक्शनों से गुदी हुई, कूल्हे में अमरूद के बराबर फोड़ा, आख़िरी दम, और चींटियाँ जिस्म में लगना शुरू हो गयीं, क्या हँस कर कहता है- “ये चींटी साहबा भी किस क़दर बेसब्र हैं।” यानी वक्त से पहले अपना हिस्सा लेने आ पहुँचीं। यह मरने से दो दिन पहले कहा। दिल चाहिए। पत्थर का कलेजा हो, मरते वक़्त जुमले कसने के लिए।

उनका एक जुमला हो तो लिखा जाय। एक लफ्ज़ हो जो याद आये। पूरी-की-पूरी किताबें ऐसे-ऐसे चुटकुलों से भरी पड़ी हैं। दिमाग़ था कि इंजन! बिना आग-पानी के हर वक्त चलता रहता था, और ज़बान थी कि कैंची! इस क़दर नपे-तुले जुमले निकालती थी कि जम कर रह जाते थे।

नये लिखने वालों के आगे उनकी गाड़ी नहीं चली। दुनिया बदल गयी है, आचार-विचार बदल गये हैं। हम लोग बदज़बान हैं और मुँह-फट। हम, दिल दुखता है तो रो देते हैं। पूँजीवाद, समाजवाद और बेकारी ने हम लोगों को झुलसा दिया है। हम जो कुछ लिखते हैं, दाँत पीस-पीस कर। लिखते हैं। अपने छिपे दुखों, कुचली भावनाओं को ज़हर बनाकर उगलते हैं। वो भी दुखी थे। नादार, बीमार और मुफ़लिस थे। सरमायादारी से तंग। मगर फिर भी इतनी हिम्मत थी कि ज़िन्दगी को मुँह चिढ़ा देते थे। दुख में ठहाका लगा देते थे। वो कहानियों ही में नहीं हँसते थे। ज़िन्दगी के हर मामले में हँसकर दुख को नीचा कर देते थे।

बातों के इतने शौक़ीन कि दुनिया का कोई इन्सान हो, उससे दोस्ती। ‘खुरपा बहादुर’ में जो शाह लंकरान के हालात हैं वो एक मीरासिन से मालूम हुए। उससे ऐसी दोस्ती थी कि बस बैठे हैं और घंटों बकवास हो रही है। लोग हैरान हैं कि या अल्लाह ये बुढ़िया मीरासिन से क्या बातें हो रही हैं? मगर जो कुछ उन्होंने लिखा, उसी बुढ़िया मीरासिन ने बताया है।

और तो और, भंगिन, भिश्तिन, राह-चलतों को रोककर बातें करते थे। यहाँ तक कि कुछ दिन अस्पताल में रहे। वहाँ रात को जब ख़ामोशी हो जाती, आप चुपके से सारे मरीज़ों को समेटकर गप्पें उड़ाया करते। हज़ारों क़िस्से सुनते और सुनाते। वही क़िस्से– ‘सवाना की रूहें’, ‘महारानी का ख्वाब’, ‘चमकी’ और ‘बरेड़े’ बन गये। वो हर चीज़ ज़िन्दगी से लेते थे। और ज़िन्दगी में कितने झूठ हैं, यही बात है उनकी कहानियों में। बहुत-सी बातें विश्वास से परे मालूम होती हैं, चूंकि उनकी कल्पना हर बात पर यक़ीन करती थी।

उनके नावेल कुछ जगह वाहियात हैं, फ़ुज़ूल से। ख़ास कर ‘कोलतार’ तो बिलकुल रद्दी है। मगर उसमें भी हक़ीक़त को असली सूरत में गड़बड़ करके लिख दिया है। ‘शरीर बीवी’ तो बिलकुल फ़ुज़ूल है। मगर अपने ज़माने की बड़ी चलती हुई चीज़ थी।

‘चमकी’ एक दहकता हुआ शोला है। विश्वास नहीं होता कि इस क़दर सूखा-मारा इन्सान, जिसने अपनी बीवी के अलावा किसी तरफ़ आँख उठाकर न देखा, कल्पना में कितना ऐयाश बन जाता है। ओफ़्फ़ोह! वह चमकी की ख़ामोश निगाहों के पैग़ाम, वह हीरो का उसकी हरकतों से मंत्रमुग्ध हो जाना। और फिर लिखने वाले की ज़िन्दगी – किस क़दर मुकम्मल झूठ! यह अज़ीम भाई नहीं, उनका हमज़ाद होता था, जो उनके जिस्म से दूर होकर हुस्न-ओ-इश्क़ की ऐयाशियाँ कराता था।

अज़ीम भाई यों भी मौजूदा अदब में यानी एकदम आधुनिक साहित्य में लोकप्रिय न थे कि वो खुली बातें न लिखते थे। वो औरत का हुस्न देखते थे, पर उसका शरीर बहुत कम देखते थे। शरीर की बनावट की दास्तानें पुरानी मसनवियों (पद्य कथाओं) गुल बकावली, ज़हरे-इश्क़ वगैरह में बहुत साफ़ थीं और फिर उन्हें पुरानी कह दिया गया था। लेकिन अब फिर यह फैशन निकला है कि वही पुराना सीने का उतार-चढ़ाव, पिंडलियों की गावदुमी, रानों का भरापन नया अदब बन गया है। वो इसे अश्लीलता समझते थे और अश्लीलता से डरते थे। यद्यपि भावनाओं का नंगापन उनके यहाँ आम है, और बहुत गन्दी बातें भी लिखने में नहीं झिझकते थे। वो औरत की भावनाएँ तो नग्न देखते थे पर खुद उसे कपड़े पहना देते थे। वो ज़्यादा बेतकल्लुफ़ी से मुझसे बातें नहीं करते थे और बहुत बच्चा समझते थे। कभी किसी यौन-समस्या पर तो वो किसी से बहस करते ही न थे। एक दोस्त से सिर्फ़ इतना कहा– “नये अदीब बड़े जोशीले हैं, लेकिन भूखे हैं और ऊपर से उन पर जिन्सी असर (यौन प्रभाव) बहुत है। जो कुछ लिखते हैं, ‘अम्माँ खाना!’ मालूम होता है।” वो यह भी कहा करते कि हिन्दुस्तानी अदब में जिन्स बहुत नुमायाँ रहती है। यहाँ के लोगों पर यौन भावनाएँ सदा से हावी रही हैं। हमारे काव्य, चित्रकला, पुरानी पूजा– सभी से यौन भावना का पता चलता है। अगर ज़रा देर इश्क़-ओ-मुहब्बत को भूल जायें तो लोकप्रिय नहीं रह सकते। यही कारण है कि बहुत जल्द अदब में उनका रंग ग़ायब होकर वही ‘अलिफ लैला’ का रंग छा गया।

उन्हें हिजाब इम्तियाज़ अली (उर्दू की एक लेखिका) से ख़ास लगाव था। (मैं मोहतरमा से माफ़ी माँगकर कहूँगी, कि मरने वाले का राज़ है) कहा करते थे, ‘यह औरत बहुत प्यारे झूठ बोलती है’। उन्हें शिकायत थी कि मैं बहुत ही उलटे-सीधे झूठ बोलती हूँ। मेरे झूठ भूखे की पुकार हैं और उनके झूठ भूखे की मुस्कराहटें। अल्लाह जाने, उनका क्या मतलब होता था।

हम उनके अफ़सानों को आम तौर से ‘झूठ’ कहा करते थे। जहाँ उन्होंने कोई बात शुरू की और वालिद साहब मरहूम हँसे। “फिर ‘क़स्रे-सहरा’ लिखने लगे।” वो उनकी गप्पों को क़स्रे-सहरा कहते थे। अज़ीम भाई कहते, “सरकार! दुनिया में झूठ बग़ैर कोई रंगीनी नहीं। बात को दिलचस्प बनाना चाहो तो झूठ उसमें मिला दो।”

वो यह भी कहते थे कि जन्नत और दोज़ख़ का बयान भी तो ‘क़स्रे-सहरा’ है।

इस पर मामूँ कहते, “अरे इस ज़िन्दा लाश को मना करो कि यह कुफ़्र है।” इस पर वो मामूँ के अंधविश्वासी सुसराल वालों का मज़ाक़ उड़ाते थे।

उन्हें पीरी-मुरीदी ढोंग मालूम होता था। लेकिन कहते थे, “दुनिया का हेर ढोंग एक मज़ेदार झूठ है और झूठ ही मज़ेदार है।”

कहते थे, “मेरी सेहत इजाज़त देती तो मैं अपने बाप की क़ब्र पुजवा देता। बस दो साल क़व्वाली करा देता और चादर चढ़ाता। मज़े से आमदनी होती।”

उन्हें धोखेबाज़ और मक्कार आदमी से मिल कर बड़ी खुशी होती थी। कहते थे, “धोखा और मक्कारी मज़ाक नहीं।अक़्ल चाहिए इन चीज़ों के लिए।”

उन्हें नाच-गाने से बड़ा शौक़ था। मगर किस नाच से? ये जो फ़क़ीर बच्चे आते हैं, उनके। आम तौर से पैसे देकर धूल में नाचते हुए फ़क़ीरों को इस शौक़ से देखा करते थे कि उनकी तल्लीनता देख कर ईर्ष्या होती थी। न जाने उस नंगे-भूखे नाच में क्या कुछ नज़र आता था।

मैंने उन्हें कभी नमाज़ पढ़ते न देखा। कुरान शरीफ़ लेटकर पढ़ते थे और बे-अदबी से उसके साथ-साथ सो जाते थे। लोगों ने बुरा-भला कहा तो उस पर काग़ज़ चढ़ा कर कह दिया करते थे कि कुछ नहीं, क़ानूनी किताब है। झूठ तो ख़ूब निभाते थे।

हदीस (मुहम्मद साहब के कथन) तो बहुत पढ़ते थे और लोगों से बहस करने के लिए अजीबअजीब हदीसें ढूँढकर याद कर लेते थे और सुनाकर लड़ा करते थे। उन हदीसों से लोग बड़े आजिज़ थे। क़ुरान की आयतें भी याद थीं और बेतकान हवाला देते थे। शक करो तो सिरहाने से क़ुरान निकालकर दिखा देते थे।

यज़ीद (जिसने करबला में हज़रत हुसैन और उनके साथियों की बड़ी निर्दयता से हत्या की थी) के बड़े प्रशंसक थे और इमाम हुसैन की शान में बकवास किया करते थे। लोगों से घंटों बहस होती थी। कहते थे, “मैंने ख़्वाब में देखा कि हज़रत इमाम हुसैन खड़े हैं। उधर से यज़ीद लईन (जिसपर लानत हो) आया। आपके पैर पकड़ लिये। गिड़गिड़ाया, हाथ जोड़े तो आपका ख़ून जोश मारने लगा और उसे उठाकर सीने से लगा लिया। बस मैंने भी उस दिन से यज़ीद की इज़्ज़त शुरू कर दी। जन्नत में तो उनका मिलाप भी हो गया, फिर हम क्यों लड़े।”

राजनीति से कम दिलचस्पी थी। कहते थे, “बाबा हम लीडर नहीं बन सकते तो फिर क्या कहें। लोग कहेंगे, तुम ही कुछ करके दिखायो। और यहाँ कमबख़्त खाँसी और दमा नहीं छोड़ता।” बहुत साल हुए, कुछ लेख ‘रियासत’ में राजनीति और अर्थशास्त्र पर लिखे थे। वो न जाने क्या हुए। मज़हब का जूनून-सा था। मगर आखिर में आकर बहस कम कर दी। थी। कहते थे, “भई तुम लोग हट्टे-कट्टे हो और मैं मरने वाला हूँ। और जो कहीं दोज़ख़ जन्नत सच निकल आयीं तो मैं क्या करूँगा। लिहाज़ा चुप ही रहो।”

पर्दे के ख़िलाफ़ तो कभी से थे, पर आख़िर में कहते थे, यह पुरानी बात हो गयी। अब पर्दा रोके से नहीं रुक सकता। इस मामले में हम हार चुके, अब तो नयी परेशानियाँ हैं।” लोग कहते थे, दोज़ख़ में जाओगे तो फ़रमाते, “यहाँ कौन सी अल्लाह मियाँ ने जन्नत दे दी जो वहाँ दोज़ख़ की धमकियाँ हैं। कुछ परवाह नहीं। हम तो आदी हैं। अल्लाह मियाँ अगर हमें दोज़ख़ में जलायेंगे तो उनकी लकड़ी और कोयला बेकार जायेगा। क्योंकि हम तो हर अज़ाब (यन्त्रणा) के आदी हैं।” कभी कहते, “अगर दोज़ख़ में रहे तो हमारे जज़ (कीटाणु) तो मर जायेंगे। जन्नत में तो हम सारे मौलवियों को दिक़ में लपट लेंगे।”

यही वजह है कि सब उन्हें बाग़ी और ‘दोज़ख़ी’ कहते हैं। वो कहीं पर भी जायें, मैं देखना चाहती हूँ, क्या वहाँ भी उनकी वही कैंची-जैसी ज़बान चल रही है? क्या वहाँ भी वो हूरों से इश्क़ लड़ा रहे हैं या दोज़ख़ के फ़रिश्तों को जलाकर मुस्करा रहे हैं? मौलवियों से उलझ रहे हैं या दोज़ख़ के भड़कते शोलों में उनकी खाँसी गूँज रही है? फेफड़े फूल रहे हैं और फ़रिश्ते उनके इंजेक्शन घोंप रहे हैं? फ़र्क़ ही क्या है, एक दोज़ख़ से दूसरे दोज़ख़ में। दोज़ख़ी का क्या ठिकाना!

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Book by Ismat Chughtai: